कर्नाटक हाईकोर्ट ने रेणुकास्वामी हत्याकांड में 5 सह-आरोपियों की जमानत रद्द करने की राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि मुख्य आरोपी एक्टर darshan thoogudeepa की जमानत रद्द करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला इन पर सीधे लागू नहीं होता, क्योंकि इन्होंने जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया है और कानून के तहत इन्हें भी समान व्यवहार मिलना चाहिए।
क्या हुआ?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें रेणुकास्वामी हत्या मामले में पांच आरोपियों को मिली जमानत रद्द करने की मांग की गई थी। इन आरोपियों के नाम पुत्तास्वामी, राघवेन्द्र एन, नंदीश, धनराज डी और वी विनय हैं। इन्हें निचली अदालत ने 2024 के अंत में जमानत दी थी।
10 जून 2026 को दिए अपने फैसले में जस्टिस एस. रचाईया ने साफ कहा कि मुख्य आरोपी एक्टर darshan thoogudeepa की जमानत रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले को इन सह-आरोपियों पर सीधे तौर पर लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि निचली अदालत का जमानत देने का मूल फैसला कायम रहेगा, क्योंकि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि इन लोगों ने अपनी आजादी का दुरुपयोग किया हो या अदालत की शर्तों का उल्लंघन किया हो।
कानूनी तर्क और समानता का सिद्धांत
कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का एक अहम पहलू कानून के तहत समान व्यवहार का सिद्धांत रहा। जस्टिस रचाईया ने स्पष्ट किया कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए आम नागरिकों और सेलिब्रिटी, दोनों के मामलों को एक ही कसौटी पर कसा जाना चाहिए।
इन पांचों आरोपियों को मुख्य हाई-प्रोफाइल आरोपी से अलग करते हुए, कोर्ट ने कहा कि जिन कारणों से मुख्य आरोपी की जमानत रद्द हुई थी (जैसे कि प्रभाव डालने की संभावना और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका), वे इन प्रतिवादियों पर स्वतः लागू नहीं होते। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी हाई-प्रोफाइल मामले से सिर्फ जुड़ाव होने के आधार पर, बिना किसी ठोस उल्लंघन के, व्यक्तिगत स्वतंत्रता को रद्द नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 33 वर्षीय रेणुकास्वामी की मौत से जुड़ा है, जिनका शव जून 2024 में एक सीवेज ड्रेन के पास मिला था। जांच के बाद एक्टर darshan thoogudeepa और अभिनेत्री pavitra gowda सहित 17 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि अभिनेत्री को भेजे गए संदेशों को लेकर हुए विवाद के बाद इस हत्या को अंजाम दिया गया था। हालांकि, निचली अदालत ने दिसंबर 2024 में कई आरोपियों को जमानत दे दी थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी की जमानत रद्द कर दी थी।
अभियोजन और बचाव पक्ष के तर्क
राज्य की ओर से स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर प्रसन्न कुमार पी. ने दलील दी कि पांचों सह-आरोपियों ने समान इरादे से काम किया था और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में चोटों की गंभीरता का भी जिक्र किया। अभियोजन पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सीधे तौर पर इन आरोपियों पर भी लागू करने की कोशिश की।
वहीं, बचाव पक्ष के वकील एडवोकेट रंगनाथ रेड्डी ने तर्क दिया कि जमानत रद्द करना एक गंभीर कदम है जिसके लिए गलत काम या शर्तों के उल्लंघन का पुख्ता सबूत चाहिए। उन्होंने कहा कि सेलिब्रिटी से जुड़े मामले में मीडिया और जनता का ध्यान, जमानत को नियंत्रित करने वाले स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर हावी नहीं होना चाहिए। बचाव पक्ष का कहना था कि उनके मुवक्किलों ने रिहाई के बाद से सभी अदालती आवश्यकताओं का पालन किया है।
आगे क्या?
कानूनी कार्यवाही पर नजर रखने वालों के लिए, अब यह मामला ट्रायल का अगला महत्वपूर्ण चरण है। हाईकोर्ट का फैसला न्यायपालिका के जमानत शर्तों को सार्वजनिक प्रोफाइल के बजाय सबूतों पर आधारित रखने के फोकस को रेखांकित करता है। यह देखा जाएगा कि क्या राज्य इस विशेष हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ आगे अपील करता है या ट्रायल कोर्ट सभी आरोपियों के लिए निर्धारित सुनवाई कैसे आगे बढ़ाता है।
