कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक वकील के खिलाफ हत्या के मामले में चल रही जांच पर फिलहाल रोक लगा दी है। कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी वकील को सिर्फ इसलिए आरोपी नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वह किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहा हो या सबूत जुटाने के लिए फुटेज ले रहा हो।
कोर्ट ने क्यों जताई नाराज़गी?
जस्टिस एम नागप्रसन्ना की बेंच ने जांच अधिकारी के रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने पाया कि वकील का नाम केवल इसलिए केस में जोड़ा गया ताकि उसके ऑफिस और घर के सीसीटीवी फुटेज हासिल किए जा सकें, जो कथित अपराध स्थल के पास हैं। बेंच ने इसे कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग बताया और सवाल उठाया कि किसी वकील को अपना पेशेवर काम करने के लिए ऐसे फंसाया जा सकता है?
क्या हैं आगे के कदम?
कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर किसी भी नागरिक को सिर्फ सबूत इकट्ठा करने के लिए आपराधिक मामलों में फंसाया जाने लगा, तो यह किसी की भी सुरक्षा और पेशेवर ईमानदारी के लिए खतरा बन सकता है। कोर्ट ने राज्य के पब्लिक प्रॉसिक्यूटर से इस मामले में जांच अधिकारी से निर्देश लेने को कहा है। अगर यह साबित होता है कि वकील को बिना किसी ठोस आधार के मामले में फंसाया गया, तो उस अधिकारी पर विभागीय जांच की तलवार भी लटक सकती है।
अदालती हस्तक्षेप और अगली सुनवाई
अदालत ने साफ किया कि वकीलों को बिना किसी डर के अपना काम करने देना चाहिए। इस रोक के साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फौरी राहत दी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 16 जुलाई, 2026 को होगी, जिसमें कोर्ट आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा।
