कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि कोर्ट सरकारी विभागों के ठेकेदारों को GST के तहत राहत नहीं दे सकते। कोर्ट का कहना है कि वे GST कानूनों को ओवरराइड नहीं कर सकते, जिससे ठेकेदारों को जुर्माने, ब्याज और टैक्स फाइलिंग में छूट मिलने की उम्मीदें कम हो गई हैं।
क्या हुआ?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने सरकारी ठेकेदारों के लिए गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) के अतिरिक्त बोझ से राहत के कानूनी पहलुओं को स्पष्ट किया है। चीफ जस्टिस विभु बखरू और जस्टिस केएस हेमलेखा की डिविजन बेंच ने राज्य के अधिकारियों की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार किया है। इस फैसले ने पिछले उन आदेशों को संशोधित कर दिया है जिन्होंने ठेकेदारों को ज़्यादा राहत दी थी, जिसमें टैक्स रिटर्न रिवाइज करने और GST ढांचे के तहत पेनल्टी व ब्याज माफ करने के निर्देश शामिल थे।
कॉन्ट्रैक्ट के दावे बनाम टैक्स कानून
यह कानूनी विवाद उन पब्लिक वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट्स से उपजा है जिन पर 2017 में GST लागू होने से पहले हस्ताक्षर किए गए थे। ठेकेदारों को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा जहां उनके मूल टेंडर एग्रीमेंट GST-पूर्व टैक्स संरचनाओं पर आधारित थे, जिससे नए शासन के लागू होने पर अप्रत्याशित टैक्स लागतें आईं। कई ठेकेदारों ने अदालतों का रुख किया था, जिसमें दो मुख्य मांगें थीं: एक, जिन सरकारी विभागों के लिए उन्होंने काम किया था, उनसे रीइम्बर्समेंट (खर्च की वापसी) की मांग, और दूसरा, GST अधिकारियों द्वारा शुरू की गई टैक्स वसूली की कार्रवाइयों से सुरक्षा।
कोर्ट का फैसला
कोर्ट ने कॉन्ट्रैक्ट संबंधी विवादों और वैधानिक टैक्स अनुपालन के बीच एक स्पष्ट सीमा तय की। जहां कोर्ट ने यह माना कि ठेकेदारों के पास अपने नियोक्ता विभागों से रीइम्बर्समेंट का एक वैध दावा हो सकता है, वहीं यह फैसला सुनाया कि ये निजी अनुबंध राष्ट्रीय टैक्स कानूनों पर हावी नहीं हो सकते। विशेष रूप से, बेंच ने कहा कि अदालतों के पास ऐसे रिवाइज्ड GST रिटर्न दाखिल करने की अनुमति देने का अधिकार नहीं है जो कानून के विरुद्ध हों, न ही वे कानून द्वारा निर्धारित अनिवार्य ब्याज, पेनल्टी माफ कर सकते हैं या टैक्स फाइलिंग की समय-सीमा बढ़ा सकते हैं। टैक्स के बोझ के लिए किसी भी रीइम्बर्समेंट दावे को अब टैक्स प्रशासन के माध्यम से नहीं, बल्कि सीधे नियोक्ता विभाग के खिलाफ आगे बढ़ाना होगा।
लंबित मामलों पर असर
एक अलग लेकिन संबंधित मामले में, जिसमें SKS Karkala Infra Projects और Davanagere Smart City शामिल थे, कोर्ट ने रीइम्बर्समेंट के लिए एक याचिका खारिज कर दी। मामले में शामिल कॉन्ट्रैक्ट GST लागू होने के बाद साइन किया गया था, जिसमें टैक्स देनदारियों को पहले से ही शामिल कर लिया गया था। कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि ऐसे विवादों में जटिल तथ्यात्मक मतभेद शामिल हैं और वे रिट याचिकाओं के माध्यम से समाधान के लिए उपयुक्त नहीं हैं। समान स्थिति वाले ठेकेदारों को अब हाईकोर्ट के माध्यम से तत्काल राहत मांगने के बजाय, इन विवादों को सुलझाने के लिए वैकल्पिक कानूनी चैनलों का उपयोग करने का निर्देश दिया गया है।
