जजों पर कितना बोझ?
जस्टिस अमानुल्लाह ने बताया कि जजों पर कितना भारी दबाव है। निचली अदालतों (Trial Court) के जज अक्सर प्रतिदिन 400 से 500 केसों को देखते हैं, जबकि हाई कोर्ट के जजों पर तो इससे भी ज़्यादा बोझ होता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जजों के काम करने के तय घंटे होते हैं, लेकिन केसों के निपटारे की गति काफी हद तक वकीलों पर निर्भर करती है।
वकीलों की दलीलें कैसे लाती हैं देरी?
जस्टिस अमानुल्लाह ने समझाया कि जजों को हर दलील सुननी पड़ती है, भले ही वो दोहराव वाली या बहुत लंबी लगे। उन्होंने कहा कि जज बेवजह के समय की बर्बादी रोक सकते हैं, लेकिन वे किसी दलील को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं कर सकते क्योंकि वह स्पष्ट नहीं है। वकीलों को अपनी बात रखने की आज़ादी है, और इसी ज़रूरत के चलते अक्सर देरी होती है।
यह टिप्पणी उन्होंने 5वीं ICA इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन आर्बिट्रेशन (5th ICA International Conference on Arbitration) में की। जस्टिस अमानुल्लाह ने कानूनी पेशे से आत्म-चिंतन करने का आग्रह किया। उनका मानना था कि जजों से असाधारण प्रतिभा की उम्मीद करना उल्टा पड़ सकता है, क्योंकि निष्पक्ष सुनवाई के लिए तटस्थता और खुला दिमाग महत्वपूर्ण है। असली ध्यान वकीलों द्वारा केस प्रबंधन (Case Management) में सुधार लाने पर होना चाहिए।