झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: यौन हिंसा मामलों में तुरंत होंगे सुधार, जांच की समय-सीमा तय

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AuthorAditya Rao|Published at:
झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: यौन हिंसा मामलों में तुरंत होंगे सुधार, जांच की समय-सीमा तय

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झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य में यौन हिंसा से जुड़े मामलों को संभालने के तरीके में बड़े सुधारों का आदेश दिया है। अदालल ने जांच के लिए दो महीने की समय-सीमा तय की है, 'टू-फिंगर टेस्ट' पर तुरंत रोक लगा दी है, और पीड़ितों के लिए तत्काल मुआवज़ा और शैक्षिक सहायता अनिवार्य की है। इस आदेश का मकसद ऐसे अपराधों पर कानूनी और प्रशासनिक प्रतिक्रिया को बेहतर बनाना है।

क्या हुआ?

झारखंड हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर शामिल थे, ने राज्य में यौन हिंसा के मामलों को संभालने के तरीके को पूरी तरह से बदलने के लिए कई निर्देश जारी किए हैं। अदालत का यह आदेश जांच प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने, पीड़ितों की गरिमा की रक्षा करने और बेहतर पुनर्वास और सहायता प्रणालियों को सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

जांच के लिए सख्त समय-सीमा

देरी को कम करने के लिए, अदालत ने निर्देश दिया है कि यौन हिंसा के मामलों की प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए। पूरी जांच प्रक्रिया अब अधिकतम दो महीने में पूरी करनी होगी। इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि गवाहों की मौजूदगी में मामलों में अनावश्यक स्थगन (adjournments) बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे, जिसका लक्ष्य न्याय में तेजी लाना है।

'टू-फिंगर टेस्ट' पर रोक और मेडिकल प्रोटोकॉल

हाई कोर्ट ने 'टू-फिंगर टेस्ट' के इस्तेमाल पर सख्स्त रोक लगा दी है, जो एक पुरानी मेडिकल जांच पद्धति है जिसकी व्यापक रूप से आलोचना की गई है। इस टेस्ट को करते पाए जाने वाले मेडिकल पेशेवरों पर पेशेवर कदाचार (professional misconduct) का आरोप लगाया जाएगा। अब राज्य सरकार को सभी सरकारी और निजी अस्पतालों के लिए एक बाध्यकारी सर्कुलर और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी करना होगा। इसके अतिरिक्त, इस नए प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करने के लिए डॉक्टरों, फोरेंसिक विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम लागू किए जाएंगे।

पुलिस की जवाबदेही और 'जीरो एफआईआर'

बेंच ने यौन अपराधों के मामलों में 'जीरो एफआईआर' दर्ज करने की पुलिस की कानूनी बाध्यता पर जोर दिया, चाहे मामले का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र किसी भी पुलिस स्टेशन के पास हो। अदालत ने नोट किया कि इस नियम का पालन न करने के कारण पहले पीड़ितों की महत्वपूर्ण चिकित्सा जांचों में देरी हुई थी। इस फैसले में अब किसी भी पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय और दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है जो इस आदेश का पालन करने में विफल रहता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पुलिस कर्मियों को इन संवेदनशील मामलों को संभालने के लिए बेहतर ढंग से तैयार करने हेतु समय-समय पर संवेदीकरण कार्यक्रम (sensitization programs) आयोजित किए जाएं।

पीड़ित सहायता और पुनर्वास

प्रक्रियात्मक बदलावों से परे, अदालत ने कानूनी प्रक्रिया के दौरान और बाद में पीड़ितों की सहायता के लिए उपाय पेश किए हैं। निर्णय के 30 दिनों के भीतर मुआवज़े के आदेश पारित किए जाने चाहिए। निरंतर सहायता के लिए, रांची में नारी निकेतन को एक समर्पित आश्रय गृह (shelter home) के रूप में नामित किया गया है।

दीर्घकालिक पुनर्वास में सहायता के लिए, अदालत ने निर्देश दिया है कि बलात्कार से पैदा हुए बच्चों को कक्षा बारहवीं तक मुफ्त शिक्षा दी जाएगी। इसके अलावा, IITs, NITs, AIIMS और IIMs सहित प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों में प्रवेश पाने वालों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाएगी। अदालत ने पीड़ितों की पहचान की सुरक्षा पर भी जोर दिया, और किसी भी अनधिकृत खुलासे पर दंड का प्रावधान किया। अन्य सहायता उपायों में प्रशिक्षित कानूनी सहायता, परामर्श, चिकित्सा सहायता और '112' आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली के साथ '181' महिला-केंद्रित हेल्पलाइन का एकीकरण शामिल है।

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Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.