जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: मैटरनिटी लीव है संवैधानिक अधिकार, सरकार को देने होंगे रुके हुए वेतन

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: मैटरनिटी लीव है संवैधानिक अधिकार, सरकार को देने होंगे रुके हुए वेतन

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि मैटरनिटी लीव (Maternity Leave) महिलाओं का संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि 'अकैडमिक अरेंजमेंट' पर काम कर रहे डॉक्टरों का रुका हुआ वेतन जारी किया जाए। कोर्ट ने साफ किया कि मैटरनिटी बेनिफिट्स (Maternity Benefits) को किसी एडमिनिस्ट्रेटिव ऑर्डर से नहीं रोका जा सकता।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं के लिए एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मैटरनिटी लीव (Maternity Leave) एक ज़रूरी संवैधानिक अधिकार है। जस्टिस रजनीश ओसवाल ने अपने फैसले में एक ऐसे एडमिनिस्ट्रेटिव आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत 'अकैडमिक अरेंजमेंट' पर काम कर रही महिला डॉक्टरों को मैटरनिटी लीव के दौरान वेतन देने से मना किया गया था।

इस मामले में सीनियर रेजिडेंट्स और ट्यूटर्स जैसे डॉक्टर शामिल थे, जिनकी नियुक्ति जम्मू-कश्मीर मेडिकल और डेंटल एजुकेशन रूल्स 2020 के तहत हुई थी। इन डॉक्टरों ने केंद्र शासित प्रदेश के हेल्थ और मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट के एक आदेश को चुनौती दी थी, जो 14 अक्टूबर 2025 को जारी हुआ था। इस आदेश में कहा गया था कि मैटरनिटी लीव पर रहने का समय 'आउट ऑफ असाइनमेंट' माना जाएगा और इसलिए उनका वेतन और भत्ते रोके जाएंगे। प्रशासन का तर्क था कि ये डॉक्टर रेगुलर सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि टेन्योर-बेस्ड अपॉइंटी (Tenure-based appointee) हैं, इसलिए उन्हें मैटरनिटी लीव के दौरान वेतन का हक नहीं है।

कोर्ट ने एडमिनिस्ट्रेटिव फैसले को किया खारिज

अपने फैसले में कोर्ट ने 8 जुलाई 2024 के एक सरकारी आदेश का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से इन डॉक्टरों को मैटरनिटी लीव देने के नियमों को अपनाया गया था। जस्टिस ओसवाल ने कहा कि प्रशासन एक तरफ तो इन नियमों को अपना सकता है, लेकिन दूसरी तरफ इनके तहत मिलने वाले वित्तीय लाभों को मनमाने ढंग से नहीं रोक सकता। कोर्ट ने सरकार के वेतन रोकने के प्रयास को एडमिनिस्ट्रेटिव ओवररीच (administrative overreach) करार दिया और कहा कि पूरा वेतन पाने का अधिकार सीधे मैटरनिटी लीव से जुड़ा हुआ है।

इस फैसले का समर्थन करने के लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी जिक्र किया, जैसे कि म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली बनाम फीमेल वर्कर्स (मस्टर रोल) और दीपिका सिंह बनाम पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़। इन फैसलों में भी यह लगातार माना गया है कि मैटरनिटी बेनिफिट्स (Maternity Benefits) संवैधानिक रूप से सुरक्षित हैं और इन्हें किसी भी सरकारी आदेश या विभागीय संचार से कम नहीं किया जा सकता।

सरकारी स्वास्थ्य कर्मचारियों पर असर

कोर्ट के इस फैसले से अक्टूबर 2025 का आदेश प्रभावी रूप से रद्द हो गया है और सरकार को प्रभावित डॉक्टरों का बकाया वेतन और भत्ते जारी करने का निर्देश दिया गया है। पब्लिक सेक्टर संस्थानों में इसी तरह के 'अकैडमिक' या 'टेन्योर-बेस्ड' व्यवस्था के तहत काम करने वाले कर्मचारियों के लिए, यह फैसला मैटरनिटी लीव नियमों के लागू होने को लेकर स्पष्टता लाता है। यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि एडमिनिस्ट्रेटिव नीतियां मैटरनिटी बेनिफिट्स से संबंधित संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन नहीं कर सकतीं। अब अगला कदम सरकार द्वारा कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए लंबित फंड जारी करना होगा।

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