जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने 2011 में हुई चार सिविल जजों की नियुक्तियों को अवैध करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में एक बड़ी क्लर्कल गलती हुई थी, जिसके कारण यह नियुक्तियां नियमों के बाहर थीं। कोर्ट ने सीनियरिटी (seniority) के मामले में दायर याचिका खारिज कर दी है।
क्या हुआ?
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने 2011 में नियुक्त किए गए चार सिविल जजों की नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया है। यह फैसला तब आया जब इन जजों ने उसी साल नियुक्त हुए अन्य उम्मीदवारों के साथ सीनियरिटी (seniority) के मामले में समानता का दावा किया था। जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय पऱीहार की डिविजन बेंच ने माना कि इन पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं, जिसके चलते ये नियुक्तियां नियमों के मुताबिक अमान्य हैं।
प्रशासनिक गलती की कहानी
यह पूरा मामला 2008 में राज्य के लॉ डिपार्टमेंट (Law Department) द्वारा मुंसिफ (अब सिविल जज) के पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू करने से जुड़ा है। शुरू में हाई कोर्ट ने 31 पदों के लिए भर्ती का अनुरोध किया था। लेकिन, एक बड़ी क्लर्कल गलती हुई जब लॉ डिपार्टमेंट ने गलती से जम्मू-कश्मीर पब्लिक सर्विस कमीशन (J&K PSC) को 35 पदों की जानकारी दे दी, यानी 4 अतिरिक्त पद जो थे ही नहीं।
यह गलती भर्ती प्रक्रिया के दौरान पकड़ में नहीं आई। जहां 31 उम्मीदवारों की नियुक्ति अप्रैल 2011 में हुई, वहीं PSC द्वारा सुझाए गए 35 उम्मीदवारों में से बाकी चार को बाद में उपलब्ध हुए अतिरिक्त पदों पर नियुक्त किया गया। सालों बाद, इन चारों जजों ने पहली बैच के मुकाबले अपनी सीनियरिटी (seniority) को लेकर आपत्ति जताई, जिससे यह विवाद खड़ा हुआ।
कानूनी स्थिति और शासन
अपने फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन चार जजों का नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं बनता था, क्योंकि यह नियुक्ति उन पदों के लिए हुई थी जो उस समय आधिकारिक तौर पर मौजूद ही नहीं थे। बेंच ने कहा कि इन उम्मीदवारों को भविष्य की अप्रत्याशित रिक्तियों पर समायोजित करना 'रूल्स के बाहर' (dehors the rules) था।
कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस तरह के तदर्थ समायोजन (ad-hoc adjustments) ने उन दूसरे उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन किया जो बाद के सालों में योग्य बने थे। कोर्ट ने सीनियरिटी लिस्ट को उसी स्थिति में बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी। साथ ही, यह भी कहा कि यह मामला लिस्ट प्रकाशित होने के सालों बाद कोर्ट में लाया गया, जो देरी के कारण खारिज होने योग्य था।
क्यों यह महत्वपूर्ण है?
यह फैसला सरकारी नौकरियों में प्रक्रियात्मक गलतियों से जुड़े कानूनी जोखिमों को उजागर करता है। यह एक रिमाइंडर है कि गलतियों को सुधारने के लिए की गई प्रशासनिक कार्रवाई को भी भर्ती कानूनों का कड़ाई से पालन करना चाहिए, भले ही वह सहानुभूतिवश की गई हो। यह मामला शासन और प्रशासनिक निकायों के लिए सटीक संचार और रेफरल डेटा के कड़ाई से पालन की आवश्यकता पर जोर देता है, क्योंकि छोटी सी गलती भी लंबे समय तक चलने वाले मुकदमेबाजी और सालों बाद नियुक्तियों को रद्द करने का कारण बन सकती है।
