वकीलों के लिए AI के इस्तेमाल पर SC का बड़ा फैसला, अब हर फाइलिंग में करना होगा खुलासा

LAWCOURT
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
वकीलों के लिए AI के इस्तेमाल पर SC का बड़ा फैसला, अब हर फाइलिंग में करना होगा खुलासा
Overview

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाते हुए वकीलों के लिए AI (Artificial Intelligence) के इस्तेमाल को लेकर नए नियम बनाए हैं। ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, अब वकीलों को कोर्ट में फाइल की जाने वाली हर अर्जी, सबूत या रिसर्च में AI के उपयोग का खुलासा करना अनिवार्य होगा।

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AI के इस्तेमाल पर पारदर्शिता का नया दौर

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने 'Regulations for Use of Artificial Intelligence in Courts, 2026' नाम से एक मसौदा जारी किया है। इसके तहत, अदालतों में AI के इस्तेमाल को लेकर जवाबदेही तय की जा रही है। अब वकीलों को पिटीशन, एविडेंस या रिसर्च के दौरान AI टूल्स के इस्तेमाल की जानकारी लिखित में देनी होगी। यह नियम सुनिश्चित करेगा कि ऑटोमेशन का उपयोग पारदर्शी हो और इसकी सत्यता जांची जा सके।

AI की गलतियों की पूरी जिम्मेदारी अब वकील की

इन नियमों का एक अहम हिस्सा यह है कि AI से उत्पन्न किसी भी गलत जानकारी या 'हैलुसिनेशन' (Hallucination) के लिए पूरी तरह से वकील ही जिम्मेदार होंगे। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि AI की गलती को बचाव के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। यह कदम 2023 के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट के अनुरूप है, जहां डेटा की शुद्धता के लिए मानव ऑपरेटर को ही मुख्य माना गया है। कोर्ट का यह फैसला लॉ फर्म्स को AI टूल्स के इस्तेमाल से पहले उनकी अच्छी तरह से जांच-परख करने के लिए बाध्य करेगा।

कानूनी प्रक्रिया में AI से जुड़े जोखिम

आधुनिकीकरण की इस कोशिश के बावजूद, AI के इस्तेमाल से जुड़े कुछ खतरे भी हैं। आलोचकों का कहना है कि AI पर अत्यधिक निर्भरता से कानूनी सिद्धांत स्थिर हो सकते हैं और कानून का स्वाभाविक विकास रुक सकता है। इंसानी जजों के विपरीत, AI मॉडल मौजूदा केस लॉ पर ही आधारित होते हैं, जिससे कानून का लचीलापन कम हो सकता है।

इसके अलावा, कई AI टूल्स के 'ब्लैक-बॉक्स' नेचर (यानी उनके काम करने का तरीका पारदर्शी न होना) से निष्पक्ष सुनवाई पर भी सवाल उठ सकते हैं। अगर AI की मदद से तैयार की गई दलील के पीछे का लॉजिक समझ नहीं आया, तो विरोधी पक्ष या कोर्ट के लिए उसकी वैधता जांचना मुश्किल होगा। बड़ी लॉ फर्म्स तो शायद उन्नत AI सिस्टम लगा लें, लेकिन छोटी फर्मों और अकेले प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के लिए ये नियम भारी पड़ सकते हैं। वार्षिक ऑडिट और AI इंसिडेंट डेटाबेस बनाए रखने की लागत एक दो-स्तरीय कानूनी बाजार बना सकती है।

भविष्य की राह: वैश्विक मानकों के साथ तालमेल

इन नियमों का लागू होना AI को न्याय प्रणाली में एकीकृत करने की वैश्विक कवायद का हिस्सा है। UNESCO जैसे संस्थान भी AI के न्याय में उपयोग के लिए सिद्धांत बना रहे हैं। भारत में एक सेंट्रल 'एपेक्स बॉडी' और 'सेंटर ऑफ रिसर्च एंड एक्सीलेंस ऑन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (CoRE-AI)' की स्थापना से देश के न्यायिक मानकों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के साथ संरेखित करने में मदद मिलेगी। आने वाले समय में लीगल टेक कंपनियों को न केवल तेजी से आउटपुट देने पर, बल्कि अपने प्लेटफॉर्म को 'ऑडिटेबल बाय डिज़ाइन' (Auditable by Design) बनाने पर भी ध्यान देना होगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.