इनसॉल्वेंसी में नया 'फास्ट ट्रैक' आया
भारत के कॉर्पोरेट जगत में कर्ज चुकाने के तरीकों में एक बड़ा बदलाव आया है। अब 'प्री-पैक रिजॉल्यूशन' के जरिए, परेशान कंपनियाँ अपनी देनदारियों को सुलझाने के लिए सीधे लेनदारों (creditors) के साथ तेजी से समझौते कर सकेंगी। यह मौजूदा इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत आने वाली लंबी और बोझिल प्रक्रियाओं से बिल्कुल अलग है। इसका मुख्य मकसद नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) जैसे संस्थानों पर बढ़ते दबाव को कम करना और कंपनियों की वैल्यू को बचाए रखना है। पूर्व एसबीआई चेयरमैन दिनेश खारा ने भी संकेत दिया है कि यह व्यवस्था काफी मामलों को सुलझाने में मदद करेगी, जो लंबे समय से अटके हुए हैं। यूनाइटेड किंगडम (UK) और यूनाइटेड स्टेट्स (US) जैसे देशों में प्री-पैक की सफलता को देखते हुए, भारत में भी उम्मीद है कि इससे लेनदारों को बेहतर रिकवरी मिलेगी, जो पहले के कानूनों के मुकाबले काफी बेहतर हो सकती है।
प्रमोटर्स का कंट्रोल और लेनदारों की पैनी नजर
प्री-पैक मॉडल की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें मौजूदा प्रमोटर्स कंपनी का कंट्रोल अपने हाथ में रख सकते हैं, बशर्ते वे फाइनेंशियल क्रेडिटर्स (financial creditors) के साथ एक एग्रीमेंट पर पहुँच जाएँ। AZB & Partners के फाउंडिंग पार्टनर बहराम वकील का मानना है कि यह तब सबसे अच्छा काम करता है जब बैंक मौजूदा मैनेजमेंट का समर्थन करने में सहज हों। यह 'डेटर-इन-पॉसेशन' (debtor-in-possession) मॉडल पारंपरिक कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) से अलग है, जहाँ मैनेजमेंट का कंट्रोल अक्सर बदल जाता है। हालाँकि, इस व्यवस्था में कुछ अहम टाइमलाइन और सुरक्षा उपाय (safeguards) भी शामिल किए गए हैं। अगर लेनदारों को प्रमोटर्स का रवैया ठीक नहीं लगता, तो मामले को स्टैंडर्ड, ज्यादा कठोर इनसॉल्वेंसी रूट पर ले जाया जा सकता है।
पुरानी व्यवस्था की मुश्किलें और नए मॉडल का जन्म
IBC के 2016 में लागू होने से पहले, भारत में इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया काफी बिखरी हुई थी, जिसमें बहुत देरी होती थी और यह काफी हद तक कर्जदारों के पक्ष में झुकी हुई थी। इससे असेट वैल्यू में भारी गिरावट आती थी और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) का संकट गहराता गया। IBC ने एक एकीकृत और समयबद्ध प्रक्रिया लाने की कोशिश की। 2021 में माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) के लिए प्री-पैक मैकेनिज्म को शामिल करना इसी दिशा में एक और कदम था। लेकिन, MSMEs के लिए प्री-पैक की मांग अभी तक बहुत कम रही है, क्योंकि इसकी जटिलताओं और सख्त नियमों को लेकर चिंताएं हैं।
आर्थिक अनिश्चितता के बीच 'लाइफलाइन'
मौजूदा ग्लोबल आर्थिक अनिश्चितता और सप्लाई चेन की दिक्कतों के बीच, प्री-पैक फ्रेमवर्क का आना काफी महत्वपूर्ण है। सर्विसेज, कंस्ट्रक्शन, मैन्युफैक्चरिंग और खासकर MSMEs जैसे क्षेत्र इन झटकों के प्रति ज्यादा संवेदनशील रहे हैं। प्री-पैक मैकेनिज्म इन कंपनियों के लिए एक 'लाइफलाइन' साबित हो सकता है, जो उन्हें तेजी से रीस्ट्रक्चरिंग का रास्ता दिखा सकता है। इससे नौकरियों को बचाने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
जोखिम और चुनौतियाँ: 'फॉरेंसिक बेयर' का नजरिया
जहाँ प्री-पैक मैकेनिज्म तेजी और कुशलता का वादा करता है, वहीं इसके कार्यान्वयन (implementation) में बड़े जोखिम भी छिपे हैं। प्रमोटर्स का कंट्रोल बनाए रखने का फायदा, जहाँ कंपनी चलाने में मदद कर सकता है, वहीं यह व्यक्तिगत हितों को सर्वोपरि रखने या लेनदारों की रिकवरी को नुकसान पहुँचाने का अवसर भी दे सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस समाधान की सफलता इस बात पर बहुत निर्भर करती है कि लेनदार मौजूदा प्रमोटर्स का कितना समर्थन करते हैं, जो हमेशा असेट रिकवरी के लिए सबसे अच्छा विकल्प नहीं हो सकता। इसके अलावा, प्री-पैक फ्रेमवर्क का धीमा अपनाव (uptake), खासकर MSMEs के लिए, यह दर्शाता है कि प्रक्रिया की जटिलताएँ और सख्त आवश्यकताएँ, जैसे ऑपरेशनल क्रेडिटर्स को पूरा भुगतान, शायद कई व्यवहार्य व्यवसायों को समाधान के बजाय लिक्विडेशन (परिसमापन) की ओर धकेल सकती हैं।
आगे क्या? भविष्य की राह
प्री-पैक रिजॉल्यूशन मैकेनिज्म की शुरुआत और सुधार भारत के इनसॉल्वेंसी नियमों को आधुनिक बनाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। अगर इसे मजबूत निगरानी (oversight) के साथ प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह असेट रिकवरी को बेहतर बनाने, निवेशकों का विश्वास बढ़ाने और खासकर आर्थिक अस्थिरता के माहौल में व्यवसायों को बेहतर ढंग से चलाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। इसकी असली परीक्षा इसके व्यावहारिक उपयोग और बदलते बाजार के हालातों के साथ तालमेल बिठाने की क्षमता में ही होगी।