भारत की ADR स्कीम का सच: मध्यस्थता (Mediation) में कम सेटलमेंट, लोक अदालतों से करोड़ों केस हल

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
भारत की ADR स्कीम का सच: मध्यस्थता (Mediation) में कम सेटलमेंट, लोक अदालतों से करोड़ों केस हल
Overview

भारत में विवाद सुलझाने के सिस्टम में बड़ा अंतर सामने आया है। कानून के तहत **अनिवार्य प्री-इंस्टीट्यूशन मध्यस्थता (mandatory pre-institution mediation)** के लिए 2018 से अब तक **5.6 लाख** से ज़्यादा आवेदन आए, लेकिन सेटलमेंट दर **1%** से भी कम रही। वहीं, सिर्फ 2025 में लोक अदालतों ने **14.8 करोड़** से ज़्यादा केस निपटा दिए, जो ADR सिस्टम की बड़ी खामियों को उजागर करता है।

क्यों फेल हो रही है मध्यस्थता (Mediation) स्कीम?

भारतीय अदालतों पर बोझ कम करने और विवादों को तेजी से निपटाने के लिए लाए गए अनिवार्य प्री-इंस्टीट्यूशन मध्यस्थता (mandatory pre-institution mediation) के नियम, यानी कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट का सेक्शन 12A, उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है। 2018 के मध्य से लेकर सितंबर 2025 तक 5,65,676 आवेदन इस प्रक्रिया के तहत दाखिल किए गए। लेकिन, हकीकत यह है कि इनमें से बहुत कम मामलों में कोई सेटलमेंट हो पाता है।

आंकड़ों का आईना: कम सेटलमेंट, ज़्यादा टाल-मटोल

संसद में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में 59,568 आवेदनों में से केवल 877 ही सेटल हो पाए, जो कि करीब 1.47% की दर है। इससे पिछले फाइनेंशियल ईयर 2023-24 में 51,019 आवेदनों में से 1,139 मामलों का सेटलमेंट हुआ। इन आवेदनों का एक बड़ा हिस्सा 'नॉन-स्टार्टर' (non-starter) साबित हुआ, यानी पार्टियों ने प्रक्रिया शुरू तो की, लेकिन मध्यस्थता तक पहुंची ही नहीं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं। प्रशिक्षित मध्यस्थों (mediators) की कमी, विशेष कमर्शियल मध्यस्थता सेल (mediation cells) का अभाव, और 'जरूरी अंतरिम राहत' (urgent interim relief) क्लॉज का गलत इस्तेमाल, जिससे पार्टियां मध्यस्थता को टाल देती हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल का कहना है कि यह अनिवार्य कदम 3 से 5 महीने की देरी और कानूनी खर्च का सबब बनता है, और अक्सर यह 'दिखावटी' साबित होता है। सरकार के पास उन मामलों का भी ठोस डेटा नहीं है जो तय 180-दिन की समय-सीमा पार कर जाते हैं।

लोक अदालतें: विवाद सुलझाने का असली 'वर्कहॉर्स'

वहीं, दूसरी ओर लोक अदालतें लगातार अपनी प्रभावशीलता साबित कर रही हैं। नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में नेशनल लोक अदालतों ने 14.8 करोड़ से अधिक मामलों का निपटारा किया। 2021 में यह आंकड़ा 1.27 करोड़ था। ये अदालतें कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत काम करती हैं और विवादों को सुलझाने का एक तेज, सस्ता और प्रभावी तरीका प्रदान करती हैं। लोक अदालतों के फैसले सिविल कोर्ट की डिक्री की तरह कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं और इनके खिलाफ अपील का प्रावधान नहीं है।

सिस्टम की राह में रुकावटें और भविष्य

विवाद सुलझाने के इस पूरे परिदृश्य में आर्बिट्रेशन काउंसिल ऑफ इंडिया (Arbitration Council of India) की स्थापना में हो रही देरी भी एक बड़ी रुकावट है। 2019 के आर्बिट्रेशन एंड कंसिलीएशन एक्ट में संशोधन के बावजूद, इस काउंसिल का गठन अभी तक नहीं हुआ है, जिसके कारणों का कोई स्पष्टीकरण नहीं है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यस्थता को स्वैच्छिक (voluntary) बनाना बेहतर होगा, क्योंकि वर्तमान अनिवार्य प्रक्रिया फायदे से ज़्यादा नुकसान पहुंचा रही है। हाल ही में आए मध्यस्थता अधिनियम 2023 (Mediation Act 2023) में भी प्री-लिटिगेशन मध्यस्थता को स्वैच्छिक बनाने पर जोर दिया गया है।

अनिवार्य मध्यस्थता में सार्थक सेटलमेंट हासिल करने में लगातार आ रही चुनौतियों और आर्बिट्रेशन काउंसिल जैसी प्रमुख संस्थागत सुधारों में देरी को देखते हुए, यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत वास्तव में न्याय और सुगमता के अपने वादे को पूरा कर पाएगा। इसका सीधा असर विदेशी निवेश और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' पर भी पड़ सकता है। ऐसे में, ADR रणनीतियों का गहन पुनर्मूल्यांकन करने और सिस्टम में सुधार पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

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