भारत की जांच व्यवस्था में बड़ा गैप, टेक और ट्रेनिंग कंपनियों के लिए खुला 'खजाने का दरवाज़ा'!

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत की जांच व्यवस्था में बड़ा गैप, टेक और ट्रेनिंग कंपनियों के लिए खुला 'खजाने का दरवाज़ा'!
Overview

भारत की क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है, जहां राज्य पुलिस की जांच क्षमताएं बेहद कमज़ोर साबित हो रही हैं। इसके चलते कन्विक्शन रेट (सज़ा दिलाने की दर) में भारी गिरावट आई है। इस स्थिति ने देश में फॉरेंसिक टेक्नोलॉजी, AI और खास ट्रेनिंग की मांग को आसमान पर पहुंचा दिया है, जिससे इन क्षेत्रों की कंपनियों के लिए एक बड़ा बाज़ार तैयार हो गया है।

जांच में भारी कमी, अदालतों में छूट रहे मुक़दमे!

ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, भारत में सामान्य IPC मामलों में सज़ा दिलाने की दर करीब 54% है, यानी आधे से ज़्यादा मामले जांच या सुनवाई में खामियों के चलते बरी हो जाते हैं। लेकिन, विशेष कानूनों जैसे कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत तो हाल और भी बुरा है, जहां राज्य पुलिस की कन्विक्शन रेट 2.6% जितनी कम हो जाती है। इसकी तुलना में, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) जैसी केंद्रीय एजेंसियां 95% से ज़्यादा कन्विक्शन रेट हासिल करती हैं। यह अंतर किसी कानूनी कमी का नहीं, बल्कि जांच के तरीके और उसकी बारीकियों में है।

आर्थिक अपराधों के मामलों में भी यही हाल है। प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत ED की कन्विक्शन रेट करीब 94.82% है, जबकि राज्य की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) राष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ़ 29.1% कन्विक्शन रेट दर्ज कर पाती है। इन पर हर साल 2,00,000 से ज़्यादा मामले दर्ज होने का बोझ है। नशीले पदार्थों की तस्करी (NDPS) में भी सज़ा मिलने की दर गिरफ्तारी के मुकाबले लगभग शून्य है, और POCSO एक्ट के तहत पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह दर 1% से 6% के बीच है। इस तरह की नाकामी न सिर्फ़ न्याय में देरी करती है, बल्कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे सकती है और निवेशकों का भरोसा भी कम कर सकती है, जिसका सीधा असर FDI और आर्थिक विकास पर पड़ता है।

जांच को आधुनिक बनाने में बाज़ार के लिए बड़ा अवसर

राज्य पुलिस की इन कमियों को दूर करने के लिए टेक्नोलॉजी और विशेषज्ञता की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। भारत के डिजिटल फॉरेंसिक बाज़ार का आकार, जो 2023-24 फाइनेंशियल ईयर में करीब ₹1,603 करोड़ था, 2029-30 तक बढ़कर ₹11,829 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। इसकी सालाना वृद्धि दर (CAGR) करीब 40% रहने की उम्मीद है। साइबर अपराधों में बढ़ोतरी, डेटा प्राइवेसी की ज़रूरत और सरकार की डिजिटल सुरक्षा को मज़बूत करने की पहलें इस बाज़ार को बढ़ावा दे रही हैं। सरकारी क्षेत्र ही इस बाज़ार का 81% हिस्सा है, जो सीधे तौर पर सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए एक बड़ा मौका दिखाता है।

इसके अलावा, भारत में लीगल टेक्नोलॉजी (कानूनी तकनीक) का बाज़ार भी तेज़ी से बढ़ रहा है। 2030 तक इसके USD 2,492.8 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसकी CAGR 16.2% रहने का अनुमान है। ऑटोमेशन, AI इंटीग्रेशन और क्लाउड-आधारित समाधानों की मांग इस ग्रोथ को बढ़ा रही है। जो कंपनियां एविडेंस के विश्लेषण के लिए AI-आधारित टूल्स, डिजिटल फॉरेंसिक समाधान, कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए साइबर सिक्योरिटी और विशेष जांच ट्रेनिंग प्रोग्राम पेश कर रही हैं, वे इस मांग का फायदा उठाने के लिए अच्छी स्थिति में हैं।

फॉरेंसिक टेक्नोलॉजी और AI की ज़बरदस्त मांग

केंद्रीय एजेंसियों की सफलता अक्सर डिजिटल एविडेंस, फॉरेंसिक अकाउंटिंग और एडवांस्ड जांच तकनीकों के इस्तेमाल से जुड़ी होती है, जो राज्य पुलिस के पास अक्सर नहीं होतीं। इसी कमी को पूरा करने के लिए एडवांस्ड टूल्स की ज़रूरत है। मोबाइल फॉरेंसिक, क्लाउड फॉरेंसिक और नेटवर्क फॉरेंसिक आजकल की जांच के अहम हिस्से हैं। स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल के कारण मोबाइल फॉरेंसिक की मांग सबसे ज़्यादा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग को फॉरेंसिक एनालिसिस टूल्स में शामिल करने से जांच की गति और सटीकता बढ़ रही है, डेटा प्रोसेसिंग को ऑटोमेट किया जा रहा है, और जटिल अपराध पैटर्न का पता लगाने में मदद मिल रही है। जो कंपनियां AI-आधारित समाधानों के साथ-साथ उनके इस्तेमाल और व्याख्या पर ट्रेनिंग भी दे सकती हैं, वे राज्य पुलिस विभागों के लिए एक आकर्षक विकल्प बनेंगी।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और भविष्य की राह

भारत में पुलिस आधुनिकीकरण के कई प्रयास हुए हैं, लेकिन मौजूदा कानूनी बदलावों के दौर में आधुनिक जांच मानकों को अपनाना ज़रूरी है। लीगल सर्विसेज मार्केट भी बढ़ रहा है, जहां AI और लीगल टेक समाधान सेवाओं को बदल रहे हैं। यह प्रवृति जांच तकनीक में भी दिख रही है; डिजिटल फॉरेंसिक सेवाओं, खासकर सरकारी एजेंसियों से, की मांग बहुत ज़्यादा है। अनुमान है कि आने वाले समय में करीब 90,000 फॉरेंसिक वैज्ञानिकों की ज़रूरत होगी। एनालिस्ट्स का मानना है कि भारत में फॉरेंसिक सर्विसेज और लीगल टेक्नोलॉजी के लिए आउटलुक सकारात्मक है, खासकर AI-आधारित एनालिटिक्स, मोबाइल फॉरेंसिक और विशेष ट्रेनिंग के क्षेत्र में। बढ़ते साइबर खतरों और नियामक अनुपालन की मज़बूरी भी इस सेक्टर के विकास को बढ़ावा दे रही है।

चुनौतियां: धीमी अपनाने की गति और स्किल की कमी

बाज़ार में स्पष्ट मांग होने के बावजूद, कुछ चुनौतियां भी हैं। भारत के डिजिटल फॉरेंसिक बाज़ार में प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी अपनाने की ज़्यादा लागत और डेटा एन्क्रिप्शन की बढ़ती जटिलता जैसे मुद्दे ग्रोथ को धीमा कर सकते हैं। राज्य पुलिस बलों में अक्सर फॉरेंसिक अकाउंटिंग और डिजिटल एविडेंस हैंडलिंग में खास ट्रेनिंग की कमी होती है, वे जटिल आर्थिक अपराधों को भी सामान्य चोरी की तरह देखते हैं। राज्य स्तर पर इन सुविधाओं की कमी और संसाधनों की सीमा इन एडवांस्ड टूल्स के प्रभावी इस्तेमाल में बाधा डाल सकती है। इसके अलावा, UAPA (2019-2023 के बीच राष्ट्रीय स्तर पर 3.2%) और NDPS (गिरफ्तारी के मुकाबले सज़ा की दर शून्य के करीब) जैसे विशेष क्षेत्रों में कम कन्विक्शन रेट, एविडेंस इकट्ठा करने, प्रक्रिया पालन और अभियोजन की रणनीति में गहरी समस्याओं को दर्शाते हैं, जिन्हें सिर्फ़ टेक्नोलॉजी से हल नहीं किया जा सकता। केंद्रीय एजेंसियों की सफलता के पीछे मज़बूत केस बिल्डिंग, बारीक फॉरेंसिक्स और विशेष कानूनी ट्रेनिंग है, इन चीज़ों को राज्य स्तर पर व्यवस्थित तरीके से अपनाने से ही सुधार आ सकता है और इस सेक्टर में निवेश आकर्षित हो सकता है।

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