डिजिटल टैक्स पावर: सरकार ने साफ की तस्वीर, पर 'AI' का डर क्यों?

LAWCOURT
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
डिजिटल टैक्स पावर: सरकार ने साफ की तस्वीर, पर 'AI' का डर क्यों?
Overview

वित्त मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 का सेक्शन 247, जो **1 अप्रैल, 2026** से लागू हो रहा है, डिजिटल सर्च या तलाशी के लिए कोई नई या असीमित पावर नहीं देता। यह **1961** के मौजूदा नियमों का ही डिजिटल रूप है।

सरकार का क्या है कहना?

आयकर विभाग और वित्त मंत्रालय ने हाल ही में इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 के सेक्शन 247 को लेकर चल रही अटकलों पर विराम लगाया है। सरकार का कहना है कि यह सेक्शन किसी भी तरह की नई या अनलिमिटेड डिजिटल तलाशी की शक्ति नहीं देता। बल्कि, यह 1961 के इनकम-टैक्स एक्ट के मौजूदा सर्च और सीजर (Search and Seizure) के प्रावधानों को ही डिजिटल युग के हिसाब से ढाला गया है। साफ है कि ये पावर केवल औपचारिक जांच (formal investigations) के लिए हैं, न कि सामान्य पूछताछ या रूटीन स्क्रूटिनी (routine scrutiny) के लिए।

'टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल' भाषा का पेंच

चिंता की मुख्य वजह सेक्शन 247 की 'टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल' (technology-neutral) भाषा है। आलोचकों का कहना है कि इस लचीलेपन का इस्तेमाल भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे एडवांस्ड टूल्स के जरिए डिजिटल जांच बढ़ाने में किया जा सकता है। भले ही सरकार AI के सीधे इस्तेमाल से इनकार कर रही है, पर 'रीज़नेबल टेक्निकल असिस्टेंस' (reasonable technical assistance) जैसे शब्दों के दायरे में AI जैसे टूल आ सकते हैं। इसका मतलब है कि आज की दी गई सफाई के बावजूद, भविष्य में यह कानूनी ढांचा डिजिटल जांच के दायरे को बढ़ा सकता है।

क्या बदलेगा और क्यों?

सेक्शन 247, जो 1 अप्रैल, 2026 से लागू होगा, इनकम-टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 132 की जगह लेगा। पुराने कानून में भी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जब्त करने और कंप्यूटर सिस्टम के एक्सेस कोड को ओवरराइड करने का प्रावधान था। नया सेक्शन आधुनिक डिजिटल रिकॉर्ड-कीपिंग को स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है और सर्च व सर्वे ऑपरेशन में डिजिटल एक्सेस के लिए कानूनी आधार देता है। यह टैक्स प्रशासन में डिजिटलीकरण की ओर भारत के बड़े कदम के अनुरूप है, जिससे पारदर्शिता और कंप्लायंस (compliance) बढ़ता है।

ग्लोबल ट्रेंड और चिंताएं

दुनिया भर में टैक्स अथॉरिटीज डेटा एनालिसिस (data analytics) और AI का इस्तेमाल टैक्स चोरी रोकने और टैक्स बेस बढ़ाने के लिए कर रही हैं। ऐसे में भारत की 'टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल' भाषा थोड़ी अस्पष्ट लगती है, जबकि टैक्स कानूनों में स्पष्टता जरूरी है। इस पर बहस बड़े प्राइवेसी (privacy) कंसर्न्स को भी उठाती है, क्योंकि डिजिटल स्पेस में संवेदनशील निजी जानकारी होती है, जिसकी सुरक्षा के लिए कड़े उपाय होने चाहिए।

अनदेखे जोखिम और बचाव

आधिकारिक आश्वासन के बावजूद, सेक्शन 247 की 'टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल' भाषा एक छिपा हुआ जोखिम पैदा करती है। 'वर्चुअल डिजिटल स्पेस' (virtual digital space) की व्यापक परिभाषा के कारण व्यक्तिगत और व्यावसायिक मामलों में अनावश्यक दखलंदाजी हो सकती है। आलोचकों का तर्क है कि डिजिटल डेटा एक्सेस करने से पहले जुडिशियल ओवरसाइट (judicial oversight) या वारंट जैसे स्पष्ट सुरक्षा उपायों का अभाव है। 'रीज़नेबल टेक्निकल असिस्टेंस' में AI-संचालित सर्विलांस (surveillance) को शामिल किया जा सकता है, जिसके लिए रेगुलेटरी सीमाएं तय नहीं हैं। इसके अलावा, पुराने टैक्स कानूनों में अस्पष्टता का इतिहास यह बताता है कि व्याख्याएं राज्य की बढ़ी हुई पहुंच के पक्ष में जा सकती हैं।

आगे का रास्ता

इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 एक अधिक डायनामिक और डिजिटल टैक्स सिस्टम की ओर इशारा करता है। सेक्शन 247 भले ही डिजिटल युग के लिए मौजूदा शक्तियों को स्पष्ट करने का इरादा रखता हो, लेकिन इसकी 'टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल' भाषा पर बहस जारी रह सकती है और आगे चलकर इसे और स्पष्ट करने की आवश्यकता पड़ सकती है। कंपनियों को अपने डिजिटल रिकॉर्ड-कीपिंग को मजबूत करना चाहिए और डेटा प्राइवेसी पर ध्यान देना चाहिए। इस बदलते रेगुलेटरी माहौल में, संभावित अस्पष्टताओं को दूर करने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए लगातार सतर्क रहना होगा।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.