अब पीड़ितों को सीधा इंसाफ नहीं
DPDP Act, 2023 ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (Information Technology Act), 2000 की धारा 43A और उससे जुड़े नियमों को रद्द कर दिया है। पहले, अगर किसी कंपनी की लापरवाही से संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा सुरक्षित रखने में चूक होती थी, तो प्रभावित व्यक्ति नुकसान का दावा कर सकता था।
लेकिन अब, डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड (Data Protection Board) द्वारा लगाई जाने वाली पेनाल्टी, जो ₹250 करोड़ तक हो सकती है, सीधे भारत के कंसोलिडेटेड फंड (Consolidated Fund of India) में जमा होगी। इसका मतलब है कि यह पैसा सीधे सरकार के राजस्व में जाएगा, न कि उन लोगों को मिलेगा जिन्हें नुकसान हुआ है।
कॉर्पोरेट जवाबदेही पर सवाल?
DPDP Act में डेटा ब्रीच के पीड़ितों के लिए डायरेक्ट कंपनसेशन मैकेनिज्म का न होना, कंपनियों की जवाबदेही पर कई सवाल खड़े करता है। हालांकि कानून कंप्लायंस न करने पर भारी जुर्माने का प्रावधान करता है, लेकिन यह पेनाल्टी अब सरकारी खजाने को भरेगी। आलोचकों का कहना है कि कंपनियों की लापरवाही और पीड़ितों को मिलने वाले सीधे वित्तीय नुकसान के बीच का यह संबंध कमजोर हो सकता है, जिससे कंपनियां डेटा सुरक्षा पर पर्याप्त निवेश करने से कतरा सकती हैं।
धारा 43A का सहारा खत्म
DPDP Act से पहले, IT Act की धारा 43A और 2011 के नियमों के तहत, डेटा लीक होने पर व्यक्तियों के लिए एक स्पष्ट कानूनी रास्ता था। यह ढांचा डेटा ब्रीच से जुड़े सिविल क्लेम के लिए एक मानक तय करता था, जिससे पीड़ित नुकसान की भरपाई के लिए आगे बढ़ सकते थे। DPDP Act द्वारा इस प्रावधान को हटाना, पीड़ित निवारण (Victim recourse) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खत्म कर देता है।
लिटिगेशन बनेगा मुश्किल
सीधे डैमेज का वैधानिक अधिकार खत्म होने के बाद, डेटा ब्रीच से प्रभावित लोगों के लिए न्याय पाना और मुश्किल हो जाएगा। धारा 43A के स्पष्ट कानूनी आधार के बिना सिविल लिटिगेशन का रास्ता चुनना जटिल हो सकता है, जिसमें एक्सपर्ट विटनेस और लंबी अदालती लड़ाइयों पर भारी खर्च आता है। आम आदमी के लिए न्याय की मांग करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
वैश्विक नियम अलग
भारत का DPDP Act, यूरोपीय संघ (EU) के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों से काफी अलग है। GDPR का आर्टिकल 82 स्पष्ट रूप से व्यक्तियों को डेटा उल्लंघनों से होने वाले भौतिक और गैर-भौतिक नुकसान के लिए कंपनसेशन का अधिकार देता है। भारत का यह कदम, जहां पेनाल्टी सीधे राज्य को जाती है, पीड़ित-केंद्रित मॉडल से अलग है।
निवेशकों की चिंताएं
निवेशकों और कारोबारियों के नजरिए से, DPDP Act का यह ढांचा एक बड़ा बदलाव है। पेनाल्टी को सीधे पीड़ितों को देने के बजाय सरकार को भेजने से, कंपनियों पर ब्रीच को रोकने का तात्कालिक वित्तीय दबाव कम हो सकता है। कंपनियां कंप्लायंस बजट के जरिए रेगुलेटरी फाइन मैनेज करने पर ज्यादा ध्यान दे सकती हैं, जो कुछ लोगों के लिए "कंप्लायंस थिएटर" जैसा हो सकता है, बजाय इसके कि वे सुरक्षा में गहरा निवेश करें।