कोर्ट की छुट्टियों पर फिर गरमाई बहस! जानें क्यों इकोनॉमी पर पड़ रहा है असर

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AuthorMehul Desai|Published at:
कोर्ट की छुट्टियों पर फिर गरमाई बहस! जानें क्यों इकोनॉमी पर पड़ रहा है असर

भारत में कोर्ट की छुट्टियों की पुरानी व्यवस्था पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। यह व्यवस्था न्यायिक देरी का कारण बनती है, जिसका सीधा असर देश की आर्थिक रफ़्तार पर पड़ रहा है। निवेशकों के लिए, खासकर व्यावसायिक और दिवालियापन (Insolvency) मामलों में, विवादों का तेज़ी से समाधान होना एक कुशल व्यापारिक माहौल के लिए ज़रूरी है। सुधारवादी व्यक्तिगत न्यायाधीशों की छुट्टी का प्रस्ताव दे रहे हैं ताकि अदालतें साल भर काम कर सकें।

क्या है पूरा मामला?

कानूनी विशेषज्ञ भारत की पारंपरिक कोर्ट छुट्टियों की व्यवस्था पर तीखे सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यह कॉलोनियल व्यवस्था (Colonial Era System) अदालतों के काम करने के समय को बहुत सीमित कर देती है। वरिष्ठ वकील एन.एल. राजा ने हाल ही में इस बात पर जोर दिया कि गर्मी और सर्दी की छुट्टियों के दौरान पूरे कोर्ट सिस्टम को बंद रखने की प्रथा से अदालतों पर मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। अब यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि मौजूदा सिस्टम-व्यापी शटडाउन मॉडल की जगह व्यक्तिगत न्यायाधीशों की छुट्टी की नीति अपनाई जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि न्यायाधीशों का व्यक्तिगत समय कम किए बिना अदालतें साल भर काम करती रहें।

अर्थव्यवस्था के लिए क्यों ज़रूरी?

निवेशक समुदाय के लिए, न्यायिक कुशलता (Judicial Efficiency) व्यापार करने में आसानी (Ease of Doing Business) का एक अहम हिस्सा है। कानूनी अड़चनें अक्सर व्यावसायिक विवादों (Commercial Disputes), अनुबंधों के प्रवर्तन (Contract Enforcement) और दिवालियापन संहिता (IBC) के तहत दिवालियापन की कार्यवाही को लंबा खींच देती हैं। जब अदालतों पर मुकदमों का भारी बोझ होता है, तो पैसा सालों तक मुकदमेबाजी में फंसा रह सकता है, जिससे व्यापार वृद्धि और नकदी प्रवाह (Liquidity) बाधित होता है। साल भर न्यायिक उपलब्धता सुनिश्चित करने वाली एक प्रणाली की ओर बढ़ने को इन देरी को कम करने का एक तरीका देखा जा रहा है। इससे उन आर्थिक विवादों का समाधान तेज़ी से हो सकता है जो लिस्टेड कंपनियों और समग्र बाज़ार की भावना (Market Sentiment) को प्रभावित करते हैं।

ज़मीनी हकीकत क्या है?

न्यायिक कार्य दिवसों (Judicial Working Days) से जुड़ा डेटा इस सुधार बहस का केंद्रीय बिंदु बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वर्तमान में सालाना लगभग 193 दिन काम करते हैं, जबकि हाई कोर्ट और सिविल कोर्ट 210 दिन तक काम करते हैं। आपराधिक ट्रायल कोर्ट, जो अधिकांश प्रक्रियात्मक मामलों को संभालते हैं, 245 दिन काम करते हैं। यह वर्तमान कैलेंडर ऐसे बड़े अंतराल छोड़ देता है जहां न्यायिक गतिविधि सीमित होती है। सुधार के समर्थक तर्क देते हैं कि काम करने के ये सीमित अवधि एक बढ़ती अर्थव्यवस्था की मांगों के अनुरूप नहीं हैं, जहां कानूनी दक्षता सर्वोपरि है।

सुधार के पिछले प्रस्ताव

यह पहली बार नहीं है जब इस प्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं। 2009 में लॉ कमीशन (Law Commission) और 2023 में एक संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) दोनों ने मुकदमों का बोझ कम करने के लिए कोर्ट की छुट्टियों को छोटा करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला था। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर. एम. लोढ़ा (R.M. Lodha) ने भी पहले एक ऐसी व्यवस्था का सुझाव दिया था जिसमें न्यायाधीश पहले से अपनी छुट्टी की तारीखें घोषित कर सकें, जिससे अदालतें काम करती रहें। इन लगातार की गई सिफारिशों के बावजूद, संरचनात्मक यथास्थिति (Structural Status Quo) काफी हद तक अपरिवर्तित रही है।

आधुनिकीकरण की राह

छुट्टियों के शेड्यूल को बदलने से परे, विशेषज्ञ न्यायिक प्रणाली के व्यापक उन्नयन (Broader Upgrade) की मांग कर रहे हैं। सुझावों में वेतन, आवास और चिकित्सा लाभों को मानकीकृत करने के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक वेतन और सेवा आयोग (Judicial Pay and Service Commission) की स्थापना, साथ ही अनुसंधान और प्रौद्योगिकी का बेहतर एकीकरण (Integration of Research and Technology) शामिल है। बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और प्रशासनिक सहायता में सुधार करके, समर्थकों का मानना है कि न्यायपालिका पारंपरिक शटडाउन अवधियों पर निर्भर हुए बिना अधिक मामलों को संभाल सकती है।

निवेशकों को क्या नज़र रखनी चाहिए?

निवेशकों और बाज़ार प्रतिभागियों को न्यायिक सेवा की शर्तों (Judicial Service Conditions) और साल भर कोर्ट संचालन के कार्यान्वयन (Implementation of Year-round Court Operations) के संबंध में किसी भी संभावित नीतिगत बदलाव (Policy Shifts) पर नज़र रखनी चाहिए। प्रमुख निगरानी योग्य (Key Monitorables) में संसदीय समितियों से अपडेट, प्रणालीगत परिचालन परिवर्तनों (Systemic Operational Changes) के संबंध में न्यायपालिका के बयान और कोर्ट के बुनियादी ढांचे और डिजिटल एकीकरण को अपग्रेड करने के उद्देश्य से कोई भी बजट आवंटन (Budget Allocations) शामिल है। ये कदम व्यापार के लिए एक अधिक कुशल कानूनी ढांचे की दिशा में प्रगति के संकेतक के रूप में काम कर सकते हैं।

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