Arbitration Hub बनने का सपना अधूरा! CJI सूर्य कांत ने बताई ये बड़ी वजह, भरोसे की कमी है मुख्य कारण।

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Arbitration Hub बनने का सपना अधूरा! CJI सूर्य कांत ने बताई ये बड़ी वजह, भरोसे की कमी है मुख्य कारण।
Overview

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने कहा है कि भरोसे की भारी कमी (Trust Deficit) वह सबसे बड़ी बाधा है जिसके कारण भारतीय संस्थान अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन (Arbitration) विवादों को आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। विधायी और न्यायिक सुधारों के बावजूद, सीजेआई ने कहा कि पक्षकार मध्यस्थों की तटस्थता, प्रक्रियात्मक अखंडता और अवार्ड लागू कराने की क्षमता में कथित खामियों के कारण विदेशों में आर्बिट्रेशन सीटों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस विश्वास की कमी का मतलब है कि भारत विवाद समाधान के वैश्विक केंद्र के रूप में अपनी क्षमता का लाभ उठाने में विफल हो रहा है, जिसका असर व्यावसायिक निश्चितता और आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ रहा है।

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भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने हाल ही में गुजरात हाई कोर्ट आर्बिट्रेशन सेंटर के उद्घाटन के मौके पर कहा कि भारत के आर्बिट्रेशन (Arbitration) को लेकर वैश्विक महत्वाकांक्षाओं और हकीकत के बीच एक बड़ा फासला है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह सिर्फ कानूनी ढांचे की बात नहीं है, बल्कि भारतीय संस्थानों पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पक्षों का भरोसा कितना है, यह सबसे अहम है। सीजेआई के मुताबिक, भरोसे की भारी कमी (Trust Deficit) वह मुख्य वजह है जिसके चलते भारतीय संस्थान अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन विवादों को अपने यहां आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं।

सीजेआई सूर्य कांत ने स्पष्ट किया कि देश में आर्बिट्रेशन और कन्सिलिएशन एक्ट में संशोधन जैसे कई विधायी और न्यायिक सुधारों के बावजूद, पक्षकार अभी भी विदेशों में आर्बिट्रेशन को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका कारण मध्यस्थों (Arbitrators) की तटस्थता (Neutrality), प्रक्रियात्मक अखंडता (Procedural Integrity) और अवार्ड (Award) को लागू कराने की क्षमता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। उनका मानना है कि यह विश्वास केवल कागजों पर सुधार लिखने से नहीं, बल्कि समय के साथ लगातार, पारदर्शी और निष्पक्ष प्रथाओं से बनता है। इस भरोसे के बिना, नए आर्बिट्रेशन सेंटरों का आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी तब तक कम प्रभावी रहेगा जब तक कि ये बड़े वाणिज्यिक विवादों को हल करने के लिए पर्याप्त विश्वास पैदा न कर पाएं।

सिंगापुर, लंदन और पेरिस जैसे प्रमुख वैश्विक आर्बिट्रेशन हब दशकों से अपनी विश्वसनीयता और दक्षता के लिए जाने जाते हैं। इन जगहों पर एक मजबूत कानूनी इकोसिस्टम, अनुभवी मध्यस्थों का एक विशेष समूह और अवार्ड्स के त्वरित निष्पादन का एक सिद्ध ट्रैक रिकॉर्ड है। यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहाँ व्यावसायिक पार्टियों के लिए 'समय ही पूंजी है और निश्चितता ही मुद्रा'। इसके विपरीत, सीजेआई के बयान से लगता है कि भारत अभी भी इस दौड़ में काफी पीछे है। भारत में संस्थागत आर्बिट्रेशन का हिस्सा अभी भी बहुत कम है, और कई पक्ष एड-हॉक आर्बिट्रेशन या पारंपरिक अदालती प्रक्रियाओं का सहारा लेते हैं। यह स्थिति भारत के लिए आर्थिक विकास, विदेशी निवेश (FDI) और विशेष कानूनी सेवाओं के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अवसरों को हाथ से जाने देने का कारण बन रही है।

विदेशों में आर्बिट्रेशन की पसंदीदा पसंद भारत के वाणिज्यिक विवाद समाधान की क्षमता के लिए एक गंभीर जोखिम पैदा करती है। यह 'बियर केस' (Bear Case) बताता है कि विश्वास का अंतर कोई छोटी समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी जड़ वाली खामी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आर्बिट्रेशन सिद्धांतों के न्यायिक और संस्थागत अनुप्रयोग में कथित विसंगतियों के कारण भारत के संस्थानों को अभी भी कई अंतरराष्ट्रीय उपयोगकर्ताओं द्वारा 'नवजात' माना जाता है। इससे व्यवसायों के लिए कथित जोखिम और लागत बढ़ जाती है, जो विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और सीमा पार लेनदेन को हतोत्साहित कर सकता है, खासकर जब वे विश्वसनीय और कुशल विवाद समाधान पर निर्भर करते हैं। इसके अलावा, यदि भारत तेजी से योग्य मध्यस्थों और मजबूत प्रशासनिक क्षमता का विकास नहीं कर पाता है, तो आर्बिट्रेशन संस्थानों की संख्या उनकी गुणवत्ता से कहीं आगे निकल सकती है, जिससे 'रूप और सार' के बीच अंतर और बढ़ जाएगा। यह स्थिति भारत को एक ऐसे देश के रूप में चित्रित कर सकती है जो सुधारों की बात तो करता है, लेकिन उन्हें लागू करने में संघर्ष करता है, जो स्थापित वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में एक महत्वपूर्ण कमजोरी है।

मुख्य न्यायाधीश कांत ने स्पष्टता और संस्थागत ईमानदारी का आह्वान किया है, जो एक कठोर आत्म-मूल्यांकन की आवश्यकता को दर्शाता है। भारत को अपनी प्रगति की तुलना सिर्फ अपने अतीत से नहीं, बल्कि अग्रणी वैश्विक आर्बिट्रेशन सीटों के कड़े मानकों और पार्टियों की वाजिब अपेक्षाओं से करनी होगी। इसके लिए मध्यस्थों के प्रशिक्षण, संस्थागत प्रशासनिक क्षमता को बढ़ाने और पारदर्शिता व ईमानदारी की संस्कृति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण निवेश की जरूरत है। अंततः, भारत का एक पसंदीदा वैश्विक आर्बिट्रेशन हब बनने का सपना तभी पूरा होगा जब वह लगातार यह साबित कर पाएगा कि उसके संस्थान विश्वास, तटस्थता और प्रवर्तनीयता का वह स्तर प्रदान करते हैं जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धियों के बराबर या उनसे बेहतर हो। आगे का रास्ता सिर्फ बुनियादी ढांचा बनाने का नहीं, बल्कि प्रदर्शित और निष्पक्ष व्यवहार के माध्यम से विश्वास का गहरा पुनर्निर्माण करने का है।

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