भारत में आर्बिट्रेशन (Arbitration) का सिस्टम मध्यस्थों (Arbitrators) की नियुक्ति को लेकर अटकी पहेली बना हुआ है। आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 11 के तहत होने वाली ये नियुक्तियां अक्सर अदालती मामलों में फंस जाती हैं, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी अनुबंधों (Contracts) से जुड़े व्यापारों में अनिश्चितता बढ़ जाती है।
मध्यस्थों की नियुक्ति पर लगातार विवाद
भारत में आर्बिट्रेशन (Arbitration) की दुनिया एक बड़ी चुनौती से जूझ रही है - मध्यस्थों (Arbitrators) के चयन का तरीका। कई कानूनी बदलावों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बावजूद, मध्यस्थों की नियुक्ति का यह प्रोसेस आए दिन कानूनी विवादों का कारण बन रहा है। जब पार्टियां किसी मध्यस्थ की नियुक्ति पर सहमत नहीं हो पातीं, तो इस पर होने वाली कानूनी लड़ाई में महीनों लग जाते हैं, जिससे आर्बिट्रेशन की वो तेजी खत्म हो जाती है जिसकी उम्मीद की जाती है।
जजों का दखल और नियुक्ति के नियम
हाल के सालों में अदालतों ने मध्यस्थों के चयन की प्रक्रिया को रेगुलेट करने में बड़ी भूमिका निभाई है। TRF Ltd. बनाम Energo Engineering Projects और Perkins Eastman Architects बनाम HSCC (India) जैसे अहम फैसलों ने पार्टियों की, खासकर सरकारी या इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े बड़े अनुबंधों में, एकतरफा मध्यस्थ नियुक्त करने की शक्ति को सीमित कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि ऐसी एकतरफा शक्ति निष्पक्षता और तटस्थता के सिद्धांतों को कमजोर करती है, इसलिए अब अनुबंधों का मसौदा तैयार करने और ट्रिब्यूनल के गठन के तरीके में बदलाव आया है।
एड-हॉक (Ad Hoc) बनाम संस्थागत मॉडल (Institutional Models)
इंडस्ट्री बॉडीज ने मुंबई सेंटर फॉर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन (Mumbai Centre for International Arbitration) और दिल्ली इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर (Delhi International Arbitration Centre) जैसे संस्थानों के ज़रिए संस्थागत आर्बिट्रेशन को बढ़ावा देने का काम किया है। हालांकि, अभी भी एड-हॉक (Ad Hoc) मॉडल का ही बोलबाला है। इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन सेक्टर की कई कंपनियां एड-हॉक आर्बिट्रेशन को ज्यादा फ्लेक्सिबल और किफ़ायती मानती हैं। लेकिन, इसी वजह से ' पैनल पैराडॉक्स' (Panel Paradox) की स्थिति पैदा होती है, जहाँ फ्लेक्सिबिलिटी की चाहत एक पारदर्शी और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया की ज़रूरत से टकराती है, और अक्सर ज्यूडिशियरी को इसमें दखल देना पड़ता है।
निवेशकों के लिए जोखिम और निगरानी
भारत में काम करने वाले निवेशकों और कंपनियों के लिए ये प्रक्रियात्मक बाधाएं एक बड़ा बिज़नेस रिस्क (Business Risk) हैं। जब किसी कॉन्ट्रैक्ट (Contract) में नियुक्ति प्रक्रिया पर कानूनी चुनौती आने का खतरा हो, तो व्यावसायिक विवादों को तेजी से सुलझाने की क्षमता प्रभावित होती है। इससे कानूनी खर्च बढ़ सकता है और प्रोजेक्ट्स के लिए अनिश्चितता लंबी खिंच सकती है। आर्बिट्रेशन एक्ट की पांचवीं और सातवीं अनुसूची (Schedules) स्वतंत्रता और निष्पक्षता के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश देती हैं, लेकिन इन नियमों की असल प्रभावशीलता इनके कठोर कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। भारतीय आर्बिट्रेशन इकोसिस्टम का अगला चरण संभवतः हाइब्रिड गवर्नेंस स्ट्रक्चर (Hybrid Governance Structures) की ओर बढ़ेगा, जो पार्टी की स्वायत्तता (Party Autonomy) और संस्थागत जवाबदेही (Institutional Accountability) के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगा। निवेशक आर्बिट्रेशन एक्ट में भविष्य के संशोधनों या न्यायिक स्पष्टीकरणों पर नज़र रख सकते हैं, जिनका उद्देश्य नियुक्ति प्रक्रियाओं को मानकीकृत करना होगा, ताकि इन व्यावसायिक मामलों में कोर्ट के दखल को कम किया जा सके।
