IBC में हुए बड़े बदलाव: भारत सरकार की बड़ी पहल, अब कंपनियां जल्द होंगी 'बचाई'

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
IBC में हुए बड़े बदलाव: भारत सरकार की बड़ी पहल, अब कंपनियां जल्द होंगी 'बचाई'
Overview

भारत की संसद ने इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) में अहम संशोधन को मंजूरी दे दी है। नए नियमों का मकसद कंपनियों के कर्ज समाधान की प्रक्रिया को तेज करना और उन्हें वित्तीय संकट से उबारने में मदद करना है।

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IBC में बड़े बदलावों को संसद की हरी झंडी!

भारत की संसद ने इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) को और बेहतर बनाने के लिए इसमें महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। Insolvency and Bankruptcy Code (Amendment) Bill, 2026 के ज़रिए ये बदलाव लाए गए हैं, जिनका लक्ष्य देश में कॉर्पोरेट वित्तीय संकट से जूझ रही कंपनियों के लिए समाधान प्रक्रिया को अधिक आकर्षक और कुशल बनाना है।

देरी की शिकायत खत्म, केस होंगे तेज़ी से स्वीकार!

नए IBC नियमों के तहत, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) को अब किसी भी इंसॉल्वेंसी एप्लीकेशन को तब स्वीकार करना होगा, जब उसमें डिफॉल्ट (Default) साबित हो जाए। पहले कई मामलों में छोटी-छोटी बातों पर केस खारिज हो जाते थे, जिससे महीनों की देरी हो जाती थी। यह बदलाव केस की शुरुआत में ही लगने वाले लंबे समय को कम करेगा और निवेशकों के लिए अनिश्चितता घटेगी।

कोर्ट के बाहर भी होगा समाधान: CIIRP की शुरुआत

एक बड़ा कदम उठाते हुए, नए कानून में क्रेडिटर-इनिशिएटेड इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIIRP) की शुरुआत की गई है। इसका मतलब है कि अब लेनदार (Creditors) कोर्ट के बाहर भी समाधान की प्रक्रिया शुरू कर सकेंगे। अगर 51% वित्तीय लेनदार राज़ी होते हैं, तो वे तेज़ी से डील फाइनल कर सकते हैं। फिलहाल, स्टैंडर्ड कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में औसतन 603 दिन लगते हैं, जो तय 330 दिन की समय सीमा से कहीं ज़्यादा है। CIIRP इस समस्या का समाधान करेगा।

ग्रुप और क्रॉस-बॉर्डर इंसॉल्वेंसी के लिए भी नियम

आज की ग्लोबल इकोनॉमी को देखते हुए, नए संशोधनों में ग्रुप इंसॉल्वेंसी (Group Insolvency) और क्रॉस-बॉर्डर इंसॉल्वेंसी (Cross-Border Insolvency) को लेकर भी स्पष्ट नियम बनाए गए हैं। यह UNCITRAL Model Law on Cross-Border Insolvency जैसे अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है। इससे मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए अलग-अलग देशों में फंसे मामलों का समाधान आसान होगा और विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।

डिस्ट्रेस्ड एसेट्स मार्केट को मिलेगी रफ़्तार

इन सुधारों से भारत के डिस्ट्रेस्ड एसेट्स (Distressed Assets) मार्केट को बड़ी तेज़ी मिलने की उम्मीद है। उम्मीद है कि अब निवेशक और फंड्स कम देरी और कानूनी अड़चनों के कारण इन मामलों में निवेश करने के लिए ज़्यादा उत्साहित होंगे। यह बदलाव इस सोच को बढ़ावा देगा कि संकटग्रस्त संपत्तियां भी एक रणनीतिक अवसर हो सकती हैं।

इंसॉल्वेंसी टाइमलाइन में सुधार

IBC 2016 में लागू होने के बाद से, रिकवरी रेट में तो सुधार हुआ है (26.5 सेंट से 71.6 सेंट प्रति डॉलर तक), लेकिन समाधान में लगने वाला समय अब भी वैश्विक मानकों से ज़्यादा है। भारत में जहां इंसॉल्वेंसी खत्म होने में करीब 1.6 साल लगते हैं, वहीं अमेरिका, यूके और ऑस्ट्रेलिया में यह 1.0 साल और सिंगापुर में 0.8 साल है। नए नियम इस गैप को पाटने में मदद करेंगे।

क्या हैं चिंताएं?

कानूनी सुधारों के बावजूद, इनके लागू होने को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। कई जानकारों का मानना है कि कानून से ज़्यादा समस्या इसके सपोर्ट सिस्टम, जैसे ट्रिब्यूनल की क्षमता, कुशल पेशेवरों की कमी और इंफ्रास्ट्रक्चर की है।

CIIRP में 'डेटर-इन-पज़ेशन' (Debtor-in-possession) के गलत इस्तेमाल का भी डर है, जिससे मौजूदा मैनेजमेंट अपनी गलतियों के बावजूद कंपनी के एसेट्स का दुरुपयोग कर सकता है।

सरकार का विजन: बचाव, न कि सिर्फ वसूली

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि IBC का मुख्य लक्ष्य कंपनियों को बचाना है, न कि सिर्फ कर्ज वसूलना। दिसंबर 2025 तक IBC के तहत 1,376 कंपनियों के मामले सुलझाए गए हैं, जिनमें लेनदारों को ₹4.11 लाख करोड़ की रिकवरी हुई है। नए नियम इस प्रक्रिया को और बेहतर बनाएंगे।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.