लॉ फर्म्स में क्यों मची है भगदड़?
भारत का लीगल सर्विसेज मार्केट (Legal Services Market) इस समय जबरदस्त ग्रोथ (Growth) देख रहा है। मजबूत अर्थव्यवस्था और बढ़ती रेगुलेटरी कॉम्प्लेक्सिटी (Regulatory Complexity) के चलते कॉर्पोरेट लीगल स्पेंडिंग (Corporate Legal Spending) में भारी उछाल आया है। पिछले वित्त वर्ष 2025 में इंडिया इंक (India Inc) का लीगल खर्च ₹62,146 करोड़ को पार कर गया, जो पिछले साल से 11% ज्यादा है। एम&ए (M&A), डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन (Dispute Resolution) और कड़ाई से कंप्लायंस (Compliance) के नियमों के चलते यह खर्च वित्त वर्ष 2026 में ₹69,000–₹72,000 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।
यह बढ़ता लीगल खर्च टॉप वकीलों के लिए नए मौके बना रहा है, लेकिन फर्म्स के अंदर प्रमोशन (Promotion) के लिमिटेड मौके सीनियर प्रोफेशनल्स को कहीं और जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। AZB & Partners और JSA Advocates & Solicitors जैसी फर्म्स प्राइवेट इक्विटी (Private Equity), एम&ए और रेगुलेटरी एडवाइस जैसे एरिया में नए टैलेंट को हायर कर रही हैं।
पार्टनरशिप मॉडल पर बड़ा सवाल?
भारतीय लीगल सर्विसेज मार्केट के 2024 में USD 45.2 बिलियन और 2030 तक USD 67.4 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसकी कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 6.7% रहने का अनुमान है। भारत के महत्वाकांक्षी जीडीपी (GDP) लक्ष्य, पॉलिसी-ड्रिवन एम&ए एक्टिविटी और लीगल टेक्नोलॉजी (Legal Technology) के बढ़ते इस्तेमाल से यह ग्रोथ संभव हो रही है।
इसकी वजह से 2025 में लैटरल पार्टनर हायरिंग (Lateral Partner Hiring) में भारी बढ़ोतरी हुई, 5 साल के हाई पर 3,000 पार्टनर्स ने फर्म्स बदलीं, जो पिछले साल से 10% ज्यादा है। लिटिगेशन (Litigation) और कॉर्पोरेट लॉ (Corporate Law) इस मामले में सबसे आगे रहे।
लेकिन, कई पार्टनर्स के लिए ट्रेडिशनल मॉडल में पार्टनरशिप का आकर्षण कम हो रहा है। जो हिस्सेदारी (partnership share) ऑफर की जाती है, वह अक्सर सिर्फ नाम की लगती है, उसमें असल दम नहीं होता। पार्टनर्स को लगता है कि उनके योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। इस वजह से अब तेज तरक्की, बिजनेस डेवलपमेंट सपोर्ट और ज्यादा आज़ादी जैसी बातों पर चर्चा हो रही है।
इस बीच, बड़ी मिड-टियर फर्म्स अपने नेटवर्क और प्रैक्टिस एरिया बढ़ाने के लिए विलय (Mergers) और अधिग्रहण (Acquisitions) पर ध्यान दे रही हैं। इंटरनेशनल फर्म्स भी भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं, जिससे मार्केट में कंपटीशन और बढ़ा है। AZB & Partners, Cyril Amarchand Mangaldas और Khaitan & Co. जैसी टॉप फर्म्स अपनी इंटरनेशनल कैपेबिलिटीज़ के लिए पहचानी जाती हैं।
पार्टनर छोड़ने के बड़े खतरे?
सीनियर वकीलों के कंपनी छोड़ने से लॉ फर्म्स के लिए बड़े खतरे पैदा हो गए हैं। खास तौर पर उन वकीलों के जाने से जिनके पास बड़े क्लाइंट्स (Clients) हैं, फर्म की इंस्टिट्यूशनल नॉलेज (Institutional Knowledge) और क्लाइंट रिलेशनशिप्स (Client Relationships) को नुकसान पहुंचता है, जिसका सीधा असर रेवेन्यू (Revenue) पर पड़ता है।
लैटरल पार्टनर्स को हायर और इंटीग्रेट (Integrate) करना महंगा और अनिश्चितता से भरा होता है। कल्चरल मिसमैच (Cultural Mis-match) जैसी वजहों से ऐसे हायरिंग अक्सर फेल हो जाते हैं। जो फर्म्स इन दिक्कतों - जैसे अपर्याप्त पहचान, लिमिटेड निर्णय लेने की शक्ति, या सिर्फ नाममात्र की हिस्सेदारी - को दूर नहीं करेंगी, वे और भी बिखराव का शिकार हो सकती हैं।
मौजूदा मॉडल में, जहां ओनरशिप (Ownership) और बड़े अधिकार अक्सर कुछ ही वकीलों तक सीमित होते हैं, प्रोफेशनल मैनेजमेंट (Professional Management) को शामिल करना मुश्किल होता है, जो स्केलेबिलिटी (Scalability) और एफिशिएंसी (Efficiency) के लिए जरूरी है। इसके अलावा, आक्रामक लैटरल हायरिंग ऑर्गेनिक टैलेंट डेवलपमेंट (Organic Talent Development) और सक्सेशन प्लानिंग (Succession Planning) को कमजोर कर सकती है। लीगल टेक्नोलॉजी का बढ़ता इस्तेमाल भी पारंपरिक एसोसिएट (Associate) रोल्स को चुनौती दे रहा है, जिससे जूनियर वकीलों के बीच असंतोष बढ़ सकता है।
आगे क्या?
जब तक फर्म्स अपने लीडरशिप स्ट्रक्चर (Leadership Structure) में बड़े बदलाव नहीं करतीं, सक्सेशन प्लानिंग को मजबूत नहीं करतीं और महत्वपूर्ण प्रैक्टिस एरियाज में गहराई नहीं बढ़ातीं, तब तक यह उथल-पुथल जारी रहने की उम्मीद है। अब ऐसी फर्म्स की तरफ झुकाव बढ़ रहा है जो स्पष्ट करियर प्रोग्रेशन (Career Progression), अर्थपूर्ण भागीदारी (meaningful participation) और ज्यादा आज़ादी दे सकें, साथ ही टेक्नोलॉजी और क्लाइंट-सेंट्रिक सर्विस डिलीवरी (Client-Centric Service Delivery) में भी स्ट्रैटेजिक निवेश करें।