India Courts: AI और Plea Bargain से 5.5 करोड़ केसों का अंबार होगा साफ!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India Courts: AI और Plea Bargain से 5.5 करोड़ केसों का अंबार होगा साफ!
Overview

भारत की न्यायपालिका में लंबित केसों के भारी अंबार को कम करने के लिए बड़े सुधारों की पहल शुरू हो गई है। हाल ही में हुई एक बैठक में लीगल लीडर्स ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और Plea Bargaining (प्ली बारगेनिंग) जैसी तकनीकों और प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करके ज्यूडिशियरी (Judiciary) की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है। इसका मुख्य लक्ष्य **5.5 करोड़** से ज्यादा पुराने केसों को जल्द निपटाना है, जो भारतीय कानूनी व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

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कार्यक्षमता बढ़ाने और Plea Bargaining पर जोर

OP Jindal Global University और National Law University Delhi द्वारा आयोजित एक सेमिनार में भारतीय न्यायपालिका के कामकाज को सुचारू बनाने पर जोर दिया गया। अटॉर्नी जनरल R. Venkataramani ने Plea Bargaining (प्ली बारगेनिंग) के लिए एक नए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल का प्रस्ताव दिया है। उनका मानना है कि इससे सरकारी संसाधनों की बचत होगी और आरोपियों को भी रियायत मिल सकती है। Plea Bargaining, भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का एक उभरता हुआ हिस्सा है और इसे देश के भारी न्यायिक बैकलॉग (Judicial Backlog) यानी लंबित केसों के पहाड़ को कम करने का एक तरीका देखा जा रहा है। मार्च 2026 तक, देश में लंबित मामलों की संख्या 5.58 करोड़ को पार कर गई थी। यह कदम Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 जैसे कानूनों के अनुरूप है, जिन्होंने केसों के समाधान में तेजी लाने के लिए Plea Bargaining के नियमों को अपडेट किया है। हालांकि कुछ आलोचक चिंता जता रहे हैं कि इससे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकारों पर असर पड़ सकता है, लेकिन ओवरबर्डन्ड सिस्टम (Overburdened System) के लिए इसे एक व्यावहारिक कदम माना जा रहा है। दिसंबर 2025 तक, अकेले जिला और अधीनस्थ अदालतों में 4.8 करोड़ से ज्यादा केस लंबित थे। इसका एक बड़ा कारण जजों की भारी कमी है, जहां प्रति दस लाख लोगों पर केवल लगभग 21 जज हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों से काफी कम है।

AI और टेक्नोलॉजी से न्याय में क्रांति

टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को न्याय वितरण के तरीके को बदलने में महत्वपूर्ण बताया गया। प्रोफेसर (Dr.) C. Raj Kumar ने न्यायिक क्षमता को बढ़ाने के लिए टेक्नोलॉजी और AI का उपयोग करने का सुझाव दिया। यह सरकार के e-Courts Phase III प्रोजेक्ट के अनुरूप है, जिसके तहत 2027 तक हाई कोर्ट्स में AI और ब्लॉकचेन को एकीकृत करने के लिए ₹53.57 करोड़ का आवंटन किया गया है। AI टूल्स जैसे SUPACE और SUVAS पहले से ही कानूनी अनुसंधान, अनुवाद और केस मैनेजमेंट में उपयोग किए जा रहे हैं ताकि दक्षता और पहुंच में सुधार हो सके। भारतीय लीगल टेक्नोलॉजी (Legal Technology) मार्केट में काफी वृद्धि की उम्मीद है, जिसके राजस्व 2030 तक USD 2,492.8 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। यह 2025-2030 के बीच 16.2% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ेगा। लीगल AI मार्केट (Legal AI Market) में इससे भी तेज वृद्धि की भविष्यवाणी है, जो 23% CAGR से बढ़कर 2030 तक USD 106.3 मिलियन तक पहुंच सकती है। यह डिजिटल बदलाव AI का उपयोग करके स्मार्ट शेड्यूलिंग और केस बैकलॉग को कम करने जैसे कार्यों के माध्यम से एक अधिक प्रतिक्रियाशील और पारदर्शी न्यायिक प्रणाली बनाने का लक्ष्य रखता है।

नए फ्रेमवर्क: लीगल हेल्थ इंडेक्स और पहुंच

डेटा-संचालित शासन (Data-driven governance) की ओर एक बदलाव पर भी चर्चा की गई। अटॉर्नी जनरल Venkataramani ने न्यायिक प्रदर्शन को मापने और प्रबंधित करने के लिए एक 'लीगल हेल्थ इंडेक्स' (Legal Health Index) का प्रस्ताव रखा। यह इंडेक्स, जो संभवतः लॉ स्कूलों द्वारा विकसित किया जाएगा, निवारक उपायों की पहचान करने और न्याय की सुलभता का आकलन करने में मदद करेगा, जिसका लक्ष्य प्रदर्शन को मानकीकृत करना और जवाबदेही में सुधार करना है। सीनियर एडवोकेट Abhishek M. Singhvi ने पहुंच, बैकलॉग, लागत और देरी (ABCD - Access, Backlog, Cost, Delay) जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को संबोधित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इन विचारों को प्रक्रियात्मक सुधारों, सक्रिय केस प्रबंधन और मजबूत मध्यस्थता (Mediation) के साथ जोड़कर एक अधिक व्यापक, परिणाम-केंद्रित कानूनी प्रणाली की ओर इशारा करता है। भारतीय कानूनी सेवा बाजार (Indian legal services market) पहले से ही बढ़ रहा है, जिसके 2034 तक USD 42,094.50 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, और AI टेक्नोलॉजी से दक्षता और पहुंच बढ़ने की संभावना है।

चुनौतियाँ: डिजिटल डिवाइड और नैतिकता

इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद, महत्वपूर्ण बाधाएं बनी हुई हैं। डिजिटल डिवाइड (Digital Divide) एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि कई लोगों के पास टेक्नोलॉजी की पहुंच नहीं है, जिससे असमानताएं बढ़ सकती हैं यदि AI और डिजिटल सेवाएं सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध न हों। AI से संबंधित नैतिक चिंताएं, जैसे पक्षपाती एल्गोरिदम, डेटा गोपनीयता और AI द्वारा गलत कानूनी उद्धरण (Hallucinations) उत्पन्न करने का जोखिम, न्यायिक अखंडता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। सुधार के पिछले प्रयासों को अक्सर धीमी गति से लागू होने, प्रतिरोध और जजों की कमी का सामना करना पड़ा है। जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया लंबी हो सकती है, जिससे रिक्तियां बढ़ जाती हैं। टेक्नोलॉजी पर निर्भरता भी जोखिम लाती है; सिस्टम की अखंडता मजबूत मानवीय निरीक्षण और शासन पर निर्भर करती है। AI को त्रुटियों के लिए जवाबदेह ठहराने के लिए सावधानीपूर्वक नीति और कानूनी विकास की आवश्यकता होगी, ऐसे क्षेत्र जहां भारत के नियम अभी भी विकसित हो रहे हैं।

भविष्य का रास्ता: अधिक टेक्नोलॉजी-संचालित न्यायपालिका

चर्चाएँ भारत की न्याय प्रणाली में अधिक दक्षता, टेक्नोलॉजी एकीकरण और डेटा उपयोग की ओर एक रणनीतिक बदलाव का संकेत देती हैं। लीगल टेक और AI समाधानों के लिए बाजार पूर्वानुमान इस अपेक्षित परिवर्तन को दर्शाते हैं, जिसमें कानूनी स्वचालन (Automation) और एनालिटिक्स के लिए सॉफ्टवेयर और सेवाओं में मजबूत वृद्धि की उम्मीद है। Plea Bargaining और प्री-ट्रायल स्टेप्स (pre-trial steps) पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ e-Courts Phase III जैसे प्रोजेक्ट्स में AI का उपयोग, यह बताता है कि लीगल सर्विस प्रोवाइडर्स (Legal Service Providers) और टेक्नोलॉजी फर्म्स केस समाधान में तेजी लाने में महत्वपूर्ण होंगे। बुनियादी ढांचे, डिजिटल साक्षरता और नैतिक नियमों के संबंध में चुनौतियाँ बनी हुई हैं, लेकिन इन सुधारों की गति एक बड़े बदलाव का संकेत देती है, जो भारत के कानूनी क्षेत्र को महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति और परिचालन समायोजन के लिए तैयार कर रही है।

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