IBC में रिकवरी 23% पर गिरी: एक दशक का कड़वा सच!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
IBC में रिकवरी 23% पर गिरी: एक दशक का कड़वा सच!
Overview

भारत की इनसॉल्वेंसी (Insolvency) व्यवस्था एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है, क्योंकि वित्तीय वर्ष 2025-26 में लेनदारों की रिकवरी गिरकर सिर्फ 23% रह गई है। NCLT (National Company Law Tribunal) में लंबित मामलों का बढ़ता बोझ, बुनियादी ढांचे की कमी और पुराने केस प्रोफाइल के कारण भारी नुकसान (haircuts) हो रहा है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब समाधान प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए अप्रैल 2026 में कानून में बदलाव भी किए गए हैं।

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वैल्यूएशन में आई भारी गिरावट

शुरुआत के एक दशक बाद भी, इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के प्रदर्शन में भारी गिरावट देखी जा रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में स्वीकार किए गए दावों (admitted claims) पर लेनदारों को लगभग 23% की रिकवरी मिली है, जो पिछले साल के 46% की तुलना में आधी है। यह गिरावट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) के तहत संपत्ति के मूल्य में गहरी कमी को दर्शाता है। पहले जहां लिक्विडेशन वैल्यू (liquidation value) से ज्यादा रिकवरी होती थी, वहीं अब क्लेम राशि में ब्याज और बकाया शुल्क जुड़ने से असली वैल्यू डिस्ट्रक्शन (value destruction) का पता नहीं चल पा रहा है।

सिस्टम की बाधाएं और अदालती बोझ

यह गिरावट नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की कार्यक्षमता से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। औसतन समाधान में 744 दिन लग रहे हैं, जो 270 दिनों की तय सीमा से कहीं ज्यादा है। NCLT पर 380 से अधिक लंबित समाधान योजना अनुमोदन (resolution plan approvals) का बोझ है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने भी न्यायिक और तकनीकी पदों पर रिक्तियों और सीमित बुनियादी ढांचे के कारण कुछ बेंचों के आधे दिन ही काम करने पर चिंता जताई है। क्षमता की इस कमी के कारण समाधान प्रक्रिया एक लंबी कानूनी लड़ाई बन गई है, जिससे कंपनी के Insolvency Pipeline में जितनी देर रहेगी, संपत्ति का मूल्य उतना ही कम होता जाएगा।

जोखिम का विश्लेषण

IBC की संरचनात्मक मजबूती पर काफी दबाव है। पिछले सालों के विपरीत, जब बड़े और मूल्यवान एसेट्स (assets) समाधान का हिस्सा होते थे, अब ज्यादातर जटिल, पुराने और बंद पड़ी कंपनियों के मामले आ रहे हैं, जिनमें मूल्य बहुत कम है। लिक्विडेशन एक डिफ़ॉल्ट विकल्प बन गया है, जो 33% से अधिक मामलों में अपनाया जा रहा है, जिससे कॉरपोरेट रिवाइवल (corporate revival) की उम्मीदें कम हो रही हैं। इसके अलावा, IBC संशोधन अधिनियम 2026 (IBC Amendment Act of 2026) में लेनदार-आरंभिक इनसॉल्वेंसी (creditor-initiated insolvency) जैसे नए प्रावधान हैं, लेकिन इनकी सफलता प्रशासनिक सुधारों के सफल कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। अनुबंध पर आधारित स्टाफ (contractual staffing) और प्रमुख ट्रिब्यूनलों में स्थायी नेतृत्व की कमी हमेशा से एक समस्या रही है, जिससे यह जोखिम बना हुआ है कि बेहतर कानून भी बैंकों के लिए समय पर पूंजी की वापसी (capital recycling) सुनिश्चित नहीं कर पाएगा।

भविष्य की राह

बाजार प्रतिभागी अब 2026 के संशोधनों के कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। तेजी से एडमिशन टाइमलाइन (admission timelines) और डिफ़ॉल्ट के प्रमाण के लिए इंफॉर्मेशन यूटिलिटी (information utility) रिकॉर्ड का उपयोग मुकदमेबाजी को कम करने की उम्मीद है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि NCLT में स्वीकृत पदों की संख्या पूरी होने तक रिकवरी की राह मुश्किल रहेगी। वर्तमान सुधारों की सफलता इस बात से तय होगी कि वे कितने व्यवहार्य संकटग्रस्त एसेट्स को लंबे समय तक चलने वाले मुकदमेबाजी से होने वाले मूल्य क्षय से बचाकर समाधान तक पहुंचा पाते हैं।

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