NCLT का बड़ा एक्शन: मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एसेट्स को बचाने के लिए IBC का गलत इस्तेमाल अब नहीं चलेगा!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
NCLT का बड़ा एक्शन: मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एसेट्स को बचाने के लिए IBC का गलत इस्तेमाल अब नहीं चलेगा!
Overview

नियामक संस्थाएं अब कॉर्पोरेट दिवालियापन (Corporate Insolvency) के एक ऐसे लूपहोल को बंद कर रही हैं, जिसका इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) की जांच से एसेट्स को बचाने के लिए किया जा रहा था। IBBI और NCLT अब सख्त डिस्क्लोजर (Disclosure) के ज़रिए प्रमोटरों को दिवालियापन का इस्तेमाल कर गलत तरीके से कमाए गए पैसों को 'वॉश' करने से रोक रहे हैं।

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कॉर्पोरेट दिवालियापन का हथियार बनना

इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) और प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) का मेल अब एक बड़े कानूनी जंग का मैदान बन गया है। जहाँ IBC का मकसद क्रेडिटर्स (Creditors) के लिए रिकवरी (Recovery) का रास्ता बनाना था, वहीं गलत लोगों ने कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) को अपनी रक्षा की ढाल बना लिया। इंसॉल्वेंसी शुरू करके, ये लोग एक 'मोरैटोरियम' (Moratorium) लागू करवा देते हैं, जिसका मकसद देनदार की स्थिति को स्थिर रखना होता है। लेकिन, इस सुविधा का गलत इस्तेमाल प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) को 'अपराध की आय' (Proceeds of Crime) के तौर पर पहचाने गए एसेट्स को जब्त करने से रोकने के लिए किया जाता रहा है।

एसेट्स को बचाने की चालाकी

यह पूरा खेल IBC की धारा 32-A के गलत इस्तेमाल पर टिका है। यह सेक्शन उन 'सक्सेसफुल रेजोल्यूशन एप्लीकेंट्स' (Successful Resolution Applicants) को पुरानी देनदारियों से 'क्लीन स्लेट' (Clean Slate) देने के लिए था। लेकिन, अब सबूत बताते हैं कि प्रमोटर मिलीभगत वाले क्रेडिटर्स (Friendly Creditors) के ज़रिए इंसॉल्वेंसी की अर्ज़ी डलवाते हैं। एक बार प्रक्रिया शुरू होने पर, वे आपराधिक तरीकों से कमाए गए पैसों को कॉर्पोरेट देनदार के जीवित रहने के लिए ज़रूरी एसेट्स के तौर पर पेश करने की कोशिश करते हैं। इससे एक ऐसा टकराव पैदा होता है जहाँ इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल (Insolvency Professional) पर इन गलत एसेट्स को बचाने की 'फिड्यूशियरी ड्यूटी' (Fiduciary Duty) का दबाव बनता है, और ट्रिब्यूनल (Tribunal) अनजाने में न्याय में बाधा डालने का हिस्सा बन जाता है।

न्यायिक सुधार और कानूनी बदलाव

हाल की अदालती फैसलों ने कॉर्पोरेट देनदारों को आपराधिक जांच से बचाने की प्रवृत्ति को उलट दिया है। नई दिल्ली NCLT द्वारा Alchemist Limited की कार्यवाही को रद्द करना एक बड़ा संकेत है कि न्यायपालिका अब धोखाधड़ी के लिए इंसॉल्वेंसी को एक सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं देगी। नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने भी इस रुख को मज़बूत किया है। उनका कहना है कि PMLA का आपराधिक अधिकार इंसॉल्वेंसी मोरैटोरियम से अलग है। अब यह सिद्धांत लागू किया जा रहा है कि IBC, राज्य के चुराई हुई दौलत को वापस पाने के अधिकार को ओवरराइड (Override) नहीं कर सकता। अगर इंसॉल्वेंसी की कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण इरादे या धोखाधड़ी से की गई पाई जाती है, तो ट्रिब्यूनल के पास अब पूरी रेजोल्यूशन प्रक्रिया को अमान्य घोषित करने का अधिकार है, जिससे देनदार को मिले सभी कानूनी सुरक्षा कवच छिन जाएंगे।

फोरेंसिक जांच और सिस्टम की कमजोरियां

इन सुधारात्मक उपायों के बावजूद, स्टेकहोल्डर्स (Stakeholders) और क्रेडिटर्स के लिए अभी भी सिस्टमैटिक जोखिम (Systemic Risks) बने हुए हैं। सबसे बड़ी समस्या रेजोल्यूशन प्रोफेशनल और एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट के बीच 'इंफॉर्मेशन एसिमेट्री' (Information Asymmetry) है। नवंबर 2025 में अटैच की गई प्रॉपर्टीज (Attached Properties) के डिस्क्लोजर (Disclosure) का मैंडेट (Mandate) आने के बावजूद, असली चुनौती नियामकों के सामने आती है, जो शेल कंपनियों (Shell Companies) के ज़रिए पैसों के जटिल फ्लो (Flow) से कई कदम पीछे हो सकते हैं। इसके अलावा, मुकदमेबाजी में देरी का जोखिम भी ज़्यादा है। इंसॉल्वेंसी से जुड़ी हर बाधा के लिए ऊपरी अदालतों में समय लेने वाली दखलंदाज़ी की ज़रूरत पड़ती है, जिससे मौजूदा स्थिति बनी रहती है और एसेट्स का और भी ज़्यादा नुकसान हो सकता है। इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल और आपराधिक अदालतों के बीच रियल-टाइम डेटा शेयरिंग (Real-time Data Sharing) की कमी सबसे बड़ी स्ट्रक्चरल कमजोरी (Structural Weakness) बनी हुई है, जिससे चतुर वित्तीय संस्थाओं के लिए नए नियामक सुरक्षा उपायों की सीमाओं को परखने का रास्ता खुला रह सकता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.