NRI को ₹2.80 करोड़ का टैक्स ब्रेक! बहन के नाम पर प्रॉपर्टी, फिर भी ITAT ने मानी असली ओनरशिप

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
NRI को ₹2.80 करोड़ का टैक्स ब्रेक! बहन के नाम पर प्रॉपर्टी, फिर भी ITAT ने मानी असली ओनरशिप
Overview

हैदराबाद बेंच के इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने एक अहम फैसला सुनाते हुए NRI रेवंत चल्लागल्ला को **₹2.80 करोड़** की कैपिटल गेन टैक्स छूट दी है। यह राहत इसलिए भी खास है क्योंकि यह प्रॉपर्टी तब खरीदी गई थी जब वह उनके नाम पर रजिस्टर नहीं थी, बल्कि उनकी बहन के नाम पर थी। ट्रिब्यूनल ने प्रॉपर्टी के रजिस्ट्रेशन की बजाय लेन-देन के असली मकसद और भुगतान को अधिक महत्व दिया।

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'सब्सटेंस ओवर फॉर्म' के सिद्धांत ने NRI को दी राहत

इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) की हैदराबाद बेंच ने 'सब्सटेंस ओवर फॉर्म' (Substance over Form) के सिद्धांत को तरजीह देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। DCIT बनाम रेवंत चल्लागल्ला मामले में, ट्रिब्यूनल ने एक NRI करदाता को ₹2.80 करोड़ की कैपिटल गेन टैक्स से छूट प्रदान की, भले ही खरीदी गई नई आवासीय प्रॉपर्टी शुरू में उनकी बहन के नाम पर रजिस्टर हुई थी। यह निर्णय दिखाता है कि अदालतों में लेन-देन के कानूनी पहलू के बजाय उसकी आर्थिक वास्तविकता और करदाता के स्पष्ट इरादे को अधिक महत्व दिया जा रहा है, खासकर जब मजबूत दस्तावेजी सबूत मौजूद हों।

प्रॉपर्टी बहन के नाम, फिर भी छूट क्यों?

मामले के अनुसार, यूके में रहने वाले NRI रेवंत चल्लागल्ला ने फाइनेंशियल ईयर 2021-22 में पांच विला ₹5.26 करोड़ में बेचे थे। उन्होंने सेक्शन 54F के तहत एक नई आवासीय प्रॉपर्टी में निवेश करके ₹2.80 करोड़ की डिडक्शन (छूट) का दावा किया। हालांकि, प्रॉपर्टी उनकी बहन श्रेया के नाम पर रजिस्टर हुई क्योंकि चल्लागल्ला भारत में खरीद प्रक्रिया को संभालने के लिए शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हो सके। टैक्स अधिकारी ने इस आधार पर छूट देने से इनकार कर दिया कि प्रॉपर्टी करदाता के नाम पर नहीं थी। लेकिन, ट्रिब्यूनल ने छूट को मंजूरी दे दी क्योंकि चल्लागल्ला यह साबित कर पाए कि पूरा भुगतान उन्हीं से हुआ था, एक ऑलॉटमेंट लेटर उनके नाम पर जारी किया गया था, और प्रॉपर्टी बाद में जनवरी 2025 में गिफ्ट डीड के माध्यम से उन्हें वापस ट्रांसफर कर दी गई।

सेक्शन 54F और इस फैसले का असर

आयकर अधिनियम का सेक्शन 54F, करदाताओं को लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स से छूट की अनुमति देता है, यदि वे संपत्ति की बिक्री से प्राप्त राशि को एक नई आवासीय प्रॉपर्टी में फिर से निवेश करते हैं। आम तौर पर, यह नई प्रॉपर्टी मूल संपत्ति बेचने के एक साल पहले या दो साल बाद खरीदी जानी चाहिए, या तीन साल के भीतर बनाई जानी चाहिए। एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि बिक्री की तारीख पर करदाता के पास एक से अधिक आवासीय घर नहीं होना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से, ऐसी छूटें तब भी दी गई हैं जब प्रॉपर्टी करदाता के जीवनसाथी या नाबालिग बच्चों के नाम पर पंजीकृत हो, बशर्ते भुगतान करदाता ने ही किया हो। चल्लागल्ला मामले में ITAT के फैसले ने इस लचीलेपन को बढ़ाते हुए, भाई-बहन के नाम पर रजिस्ट्रेशन की भी अनुमति दी है, बशर्ते वित्तीय लेन-देन और ओनरशिप का इरादा स्पष्ट रूप से साबित हो।

NRI के लिए प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन की मुश्किलें

गैर-निवासी भारतीयों (NRIs) को अक्सर भारत में प्रॉपर्टी संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें जटिल कागजी कार्रवाई, विभिन्न टाइम ज़ोन से लेन-देन का प्रबंधन, सरकारी दफ्तरों में देरी, और स्वामित्व की स्पष्टता सुनिश्चित करना शामिल है। इन समस्याओं के कारण, चल्लागल्ला के मामले की तरह, रजिस्ट्रेशन जैसे काम के लिए किसी भरोसेमंद पारिवारिक सदस्य की मदद की आवश्यकता आम है। ऐसी स्थितियों में, लेन-देन के कानूनी रूप और उसके वित्तीय सार (substance) को जोड़ने के लिए सावधानीपूर्वक रिकॉर्ड-कीपिंग की आवश्यकता होती है।

'सब्सटेंस ओवर फॉर्म' का अर्थ

'सब्सटेंस ओवर फॉर्म' का सिद्धांत कर अधिकारियों और ट्रिब्यूनल को किसी लेन-देन की केवल कानूनी संरचना के बजाय उसकी आर्थिक वास्तविकता की जांच करने की अनुमति देता है। भारतीय अदालतें टैक्स चोरी को रोकने के लिए इस सिद्धांत का तेजी से उपयोग कर रही हैं, जिसमें लेन-देन के वास्तविक स्वरूप और इरादे पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, न कि केवल उसके औपचारिक रूप पर। ITAT का यह फैसला इसी प्रवृत्ति का अनुसरण करता है, जिसमें चल्लागल्ला को उनके वित्तीय योगदान और अंतिम ओनरशिप के कारण शुरू से ही वास्तविक मालिक माना गया है।

विशेषज्ञों की राय: सतर्कता जरूरी

टैक्स विशेषज्ञों, जैसे कि जिग्नेश शाह, पार्टनर - डायरेक्ट टैक्स, भूता शाह एंड कंपनी, का कहना है कि इस तरह के फैसले टैक्स कानूनों की लचीली व्याख्या का संकेत देते हैं, लेकिन चेतावनी देते हैं कि ऐसे दावों पर भविष्य में कानूनी विवाद हो सकते हैं। करदाताओं को वैकल्पिक रजिस्ट्रेशन के लिए एक वैध कारण प्रस्तुत करना होगा, बिक्री की राशि को पुनर्निवेश से जोड़ने वाले स्पष्ट वित्तीय रिकॉर्ड रखने होंगे, उचित कानूनी दस्तावेज (जैसे गिफ्ट डीड) का उपयोग करना होगा, और यह साबित करना होगा कि लेन-देन की शुरुआत से ही वे संपत्ति के वास्तविक मालिक थे।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.