हाई कोर्ट के हालिया फैसलों ने GST इंटेलीजेंस (DGGI) की कड़ी कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने देर रात की रेड के दौरान 'वॉलंटरी' टैक्स पेमेंट को जबरन वसूली करार देते हुए, इस तरह जमा की गई रकम को वापस करने का आदेश दिया है। यह फैसला कॉर्पोरेट टैक्स जांच के तरीकों को चुनौती देता है।
हाई कोर्ट का GST एजेंसियों पर सख्त एक्शन
देश की हाई कोर्ट्स अब डायरेक्टरेट जनरल ऑफ GST इंटेलीजेंस (DGGI) की आक्रामक टैक्स वसूली तकनीकों पर कड़ी नजर रख रही हैं। हाल के फैसलों में अदालतों ने देर रात की रेड के दौरान अधिकारियों पर दबाव डालकर 'वॉलंटरी' टैक्स जमा करवाने के तरीकों को अवैध करार दिया है। जजों का मानना है कि यह कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है और ऐसे लेन-देन को जबरन वसूली के तौर पर देखा जाना चाहिए।
Swiggy केस और कोर्ट का फैसला
कर्नाटक हाई कोर्ट ने फूड डिलीवरी कंपनी Swiggy के एक मामले में इस मुद्दे पर गौर किया। DGGI अधिकारियों ने Swiggy के प्रतिनिधियों से सुबह-सुबह बड़ी रकम जमा करवाई, जिसे गिरफ्तार करने की धमकी का नतीजा बताया गया। कोर्ट ने पाया कि दस महीने तक बिना किसी औपचारिक नोटिस के जांच चलाना संवैधानिक नियमों के खिलाफ था। कोर्ट ने कहा कि टैक्स का भुगतान स्वेच्छा से होना चाहिए, न कि दबाव में। नतीजतन, हाई कोर्ट ने जमा की गई रकम को वापस करने का आदेश दिया।
इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) पर भी उठे सवाल
सिर्फ DGGI ही नहीं, दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के मुद्दे पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। दिसंबर 2023 के एक मामले में, कोर्ट ने एक ट्रेडर से रातों-रात ₹18,72,000 की ITC रिवर्स करवाने को गलत ठहराया। कोर्ट ने साफ किया कि सप्लायर के रजिस्ट्रेशन कैंसिलेशन की जानकारी मिलने मात्र से ITC का रिवर्सल अपने आप में कानूनी नहीं माना जा सकता। टैक्स डिपार्टमेंट से किसी औपचारिक रसीद के अभाव में, कोर्ट ने माना कि यह लेन-देन स्वेच्छा से नहीं हुआ था और ITC की वसूली को रोकने का निर्देश दिया।
डिजिटल युग में पुरानी रेड तकनीकों पर सवाल
न्यायपालिका अब इस बात पर जोर दे रही है कि GST नेटवर्क, रियल-टाइम रिपोर्टिंग और ई-इनवॉइसिंग जैसे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के होते हुए, देर रात की रेड जैसी पुरानी तकनीकें अनावश्यक हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इन तरीकों से कंपनियों को भारी परिचालन बाधाओं, कानूनी खर्चों और कार्यशील पूंजी के नुकसान का सामना करना पड़ता है। अब कोर्ट एक ऐसा मिसाल कायम कर रहे हैं, जिसमें किसी भी टैक्स भुगतान को कानूनी रूप से वैध मानने के लिए औपचारिक संचार और लिखित पावती की आवश्यकता होगी।
