2008 के अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने इस आतंकी हमले के 38 दोषियों की मौत की सज़ा को बरकरार रखा है। यह फैसला मामले की गंभीरता को देखते हुए 'दुर्लभ से दुर्लभ' (rarest of the rare) की श्रेणी में रखा गया है।
कोर्ट का बड़ा फैसला: मौत की सज़ा पक्की
गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस ए वाई कोगजे और जस्टिस समीर दवे की डिवीज़न बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि 2008 में हुए इन सिलसिलेवार धमाकों ने भारत की संप्रभुता को सीधी चुनौती दी थी। इस हमले में 56 लोगों की जान गई थी और 240 से ज़्यादा लोग घायल हुए थे। कोर्ट ने कुल 49 अभियुक्तों में से 38 को मौत की सज़ा सुनाई है, जबकि 11 को उम्रकैद की सज़ा दी गई है।
पीड़ितों के लिए मुआवज़े का भी आदेश
सिर्फ सज़ा सुनाना ही नहीं, बल्कि कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वे पीड़ितों को आर्थिक सहायता भी प्रदान करें। जिन लोगों की इस हमले में मौत हुई थी, उनके परिवारों को ₹10 लाख का मुआवज़ा दिया जाएगा। वहीं, गंभीर रूप से घायल हुए लोगों को ₹5 लाख का मुआवज़ा मिलेगा। कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह हमला इसलिए भी ज़्यादा खतरनाक था क्योंकि इसमें अस्पतालों को भी निशाना बनाया गया था, जहाँ पहले धमाकों से घायल हुए लोगों का इलाज चल रहा था।
साजिश का जाल और कैदियों का बर्ताव
अपने 2,223 पन्नों के फैसले में, हाईकोर्ट ने इस हमले के पीछे की बड़ी साज़िश का खुलासा किया। सबूतों में यह बात सामने आई कि दोषी आतंकवादी ट्रेनिंग कैंपों में शामिल थे और हमलों की लॉजिस्टिक्स का काम संभाल रहे थे। कोर्ट ने जेल में बंद कैदियों के बर्ताव का भी ज़िक्र किया, खासकर जब उन्होंने साबरमती सेंट्रल जेल से 213 फ़ीट लंबी सुरंग खोदकर भागने की कोशिश की थी। इन सब बातों ने उनके प्रति नरमी बरतने की दलीलों को खारिज कर दिया।
कानूनी नज़ीर और आगे की राह
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि देश को अस्थिर करने की कोशिश करने वाले ऐसे कृत्यों के खिलाफ संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखना ज़रूरी है। पिछले बड़े आतंकी मामलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब इरादा बड़े पैमाने पर आतंक फैलाना हो, तो सख़्त न्यायिक परिणाम ज़रूरी हैं। यह फैसला राज्य में लंबित आतंकी मामलों से निपटने के तरीके के लिए एक मिसाल भी बनेगा, जिसमें पीड़ितों के अधिकारों और न्याय दिलाने की राज्य की ज़िम्मेदारी पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
अब आगे इस मामले में मुआवज़े की राशि का वितरण और बचाव पक्ष की ओर से उच्च न्यायिक मंचों पर अपील की जा सकती है। यह देखना होगा कि ये कानूनी नज़ीरें भविष्य में अन्य आतंकी मामलों के निपटारे को कैसे प्रभावित करती हैं।
