NHAI पर ₹1.17 लाख करोड़ का बोझ कम करने के लिए सरकारी चाल: आर्बिट्रेटर की फीस पर लगी लगाम

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AuthorNeha Patil|Published at:
NHAI पर ₹1.17 लाख करोड़ का बोझ कम करने के लिए सरकारी चाल: आर्बिट्रेटर की फीस पर लगी लगाम

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने सरकारी हाईवे प्रोजेक्ट्स में आर्बिट्रेटर (मध्यस्थ) की फीस पर कड़े नियम लागू किए हैं। इसका मकसद नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के बढ़ते कानूनी खर्चों को कम करना है। इस नए नियम से NHAI पर चल रहे करीब ₹1.17 लाख करोड़ के निर्माण दावों (construction claims) को सुलझाने में मदद मिलेगी, जो NHAI को 2030 तक कर्ज-मुक्त बनाने की बड़ी योजना का हिस्सा है।

आर्बिट्रेटर की फीस पर कड़े नियम

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने सभी क्षेत्रीय अधिकारियों को सरकारी हाईवे प्रोजेक्ट्स से जुड़े मामलों में आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल की फीस तय करते समय आर्बिट्रेशन और कन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की चौथी अनुसूची (Fourth Schedule) का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया है। इस अनुसूची में विवाद के मूल्य के आधार पर फीस की एक तय संरचना बताई गई है। उदाहरण के तौर पर, ₹5 लाख तक के दावों के लिए फीस ₹45,000 तय की गई है, जबकि ₹20 करोड़ से अधिक के मामलों में यह फीस अधिकतम ₹30 लाख तक सीमित होगी। मंत्रालय ने पाया कि कई मामलों में फीस की गणना और भुगतान में एकरूपता नहीं थी, जिससे NHAI पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा था।

NHAI को कर्ज-मुक्त बनाने की योजना

यह कदम NHAI की 2030 तक पूरी तरह कर्ज-मुक्त (debt-free) बनने की महत्वाकांक्षी योजना का एक अहम हिस्सा है। NHAI ने वित्त वर्ष 2022 में अपने कर्ज के चरम ₹3.5 लाख करोड़ के स्तर से इसे कम करने के लिए लगातार प्रयास किए हैं। जनवरी 2026 तक NHAI पर कुल ₹2.16 लाख करोड़ का कर्ज था, जिसे अगले वित्तीय वर्ष में घटाकर ₹1.5 लाख करोड़ करने की योजना है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए, सरकार बाजार से कर्ज लेने के बजाय सीधे बजट से पैसा मुहैया करा रही है।

डेवलपर्स पर असर और विवाद समाधान

भूमि अधिग्रहण की समस्याएं और प्रोजेक्ट के दायरे में बदलाव के कारण रोड डेवलपर्स को अक्सर देरी और लागत में वृद्धि का सामना करना पड़ता है, जिसके चलते बड़ी संख्या में दावे लंबित हैं। इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए, सरकार एक टियर पेमेंट सिस्टम (tiered payment system) पेश कर रही है। नए सिस्टम के तहत, आर्बिट्रेटर फीस का 80% कार्यवाही के दौरान भुगतान किया जाएगा, और शेष 20% अंतिम अवार्ड (final award) जारी होने के बाद ही दिया जाएगा। इसका उद्देश्य मामलों को तेजी से पूरा करवाना है।

हालांकि, सरकार इन सुधारों को लागू कर रही है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि फीस कैप की प्रभावशीलता अलग-अलग हो सकती है। विवाद में शामिल पक्ष आर्बिट्रेटर की फीस पर आपसी सहमति से भी निर्णय ले सकते हैं, जो चौथी अनुसूची को दरकिनार कर सकता है। जैसा कि 2022 में ONGC बनाम Afcons Gunanusa JV मामले में देखा गया था। इसके अतिरिक्त, आर्बिट्रेटर के पास यह अधिकार होगा कि यदि वे सरकार द्वारा निर्धारित फीस संरचना को स्वीकार्य नहीं पाते हैं तो केस लेने से इनकार कर दें।

भविष्य में, मंत्रालय इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर (IIAC) जैसी स्थापित आर्बिट्रेशन संस्थाओं के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है ताकि प्रक्रिया को मानकीकृत किया जा सके। निवेशकों और हितधारकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या ये उपाय लंबित दावों के निपटारे को सफलतापूर्वक तेज करते हैं और क्या NHAI आने वाले वर्षों में अपने कर्ज कम करने की गति बनाए रख पाता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.