चुनाव आयोग (Election Commission) इस वक्त देश भर में 20 से ज़्यादा विधानसभा और लोकसभा सीटों पर उपचुनाव कराने को लेकर एक बड़ी कानूनी मुश्किल में फंसा हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लंबित चुनाव याचिकाओं (election petitions) को लेकर अदालतों के विरोधाभासी फैसले आ रहे हैं। कानून के मुताबिक, खाली सीटें 6 महीने के अंदर भरनी होती हैं, लेकिन अदालती मामलों के चलते कई सीटें सालों तक खाली रह जाती हैं।
क्या है कानूनी पेंच?
चुनाव आयोग (Election Commission) ने हाल ही में 3 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराने की पहल की है, लेकिन इससे देश भर में खाली पड़ी सीटों का बड़ा मसला सामने आ गया है। फिलहाल, देश में 14 विधानसभा सीटें और 6 लोकसभा सीटें खाली हैं। इन सीटों को भरने की कानूनी बाध्यता और अदालती विवादों के बीच संतुलन बनाना आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) की धारा 151A के तहत, चुनाव आयोग को किसी भी खाली हुई सीट पर 6 महीने के अंदर उपचुनाव कराना अनिवार्य है। हालांकि, इसके कुछ अपवाद भी हैं, जैसे कि अगर सदन का बाकी कार्यकाल एक साल से कम हो या सरकार उपचुनाव कराना अव्यावहारिक माने। लेकिन अदालतों की व्याख्याओं ने इस प्रक्रिया को और पेचीदा बना दिया है।
साल 2010 में, सुप्रीम कोर्ट ने 'इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया बनाम तेलंगाना राष्ट्र समिति' मामले में फैसला सुनाया था कि अगर किसी पिछले चुनाव के नतीजे को चुनौती देने वाली याचिका लंबित है, तो उपचुनाव नहीं कराया जाना चाहिए। अदालत का तर्क था कि अगर कानूनी चुनौती के बाद कोई दूसरा उम्मीदवार विजेता घोषित होता है, तो उपचुनाव कराना बेकार होगा। इस फैसले के बाद से, लंबित मुकदमेबाजी उपचुनाव प्रक्रिया पर रोक लगाने का काम करती है।
वहीं, साल 2019 में 'नितिन बंदोपांत सालग्रे बनाम स्टेट इलेक्शन कमीशन' मामले में अदालत ने एक अलग रुख अपनाया। इस फैसले में कहा गया कि लंबित चुनाव याचिका अपने आप में सीट भरने की प्रक्रिया को नहीं रोक सकती। इस फैसले ने चुनाव आयोग को सीट खाली रखने की स्थिति में भी कार्रवाई करने का अधिक मौका दिया, भले ही कानूनी विवाद चल रहे हों।
चुनावी देरी का शासन पर असर
इन अदालती फैसलों का असर इस बात पर निर्भर करता है कि चुनाव याचिकाएं कितनी जल्दी हल होती हैं। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार, ऐसे मामलों का निपटारा 6 महीने में हो जाना चाहिए, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। कई याचिकाएं सालों तक अटकी रहती हैं, जो कभी-कभी सदन के पूरे कार्यकाल से भी ज़्यादा समय ले लेती हैं।
इस देरी का सीधा असर उन विधानसभा क्षेत्रों के शासन पर पड़ता है जहां कोई प्रतिनिधि नहीं होता। सीट खाली होने पर, उस इलाके की आवाज़ विधानसभा में नहीं पहुँच पाती। इससे चर्चाओं में भाग लेने, महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दों पर वोट करने या विकास निधि के आवंटन की वकालत करने में बाधा आती है। हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने भी इस देरी पर निराशा जताई थी और कहा था कि मामले सालों तक अनसुलझे रह जाते हैं, जिससे मूल कानूनी विवाद चुनाव के बाद बेमानी हो जाते हैं।
आम नागरिकों और बाजार पर नज़र रखने वालों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या भविष्य में कोई कानूनी या न्यायिक कदम चुनाव आयोग को प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता देने के लिए एक स्पष्ट ढांचा प्रदान करेगा। प्रभावित क्षेत्रों के निवेशकों और हितधारकों के लिए, यह देखना अहम होगा कि ये खाली सीटें क्षेत्रीय विधायी निर्णय लेने की प्रक्रिया और स्थानीय प्रतिनिधि की देखरेख पर निर्भर विकास परियोजनाओं की निरंतरता को कैसे प्रभावित करती हैं।
