दिल्ली हाई कोर्ट के वकीलों ने एक प्रस्तावित योजना के विरोध में अपनी हड़ताल एक और दिन बढ़ा दी है। इस योजना के तहत ₹10 करोड़ तक के सिविल केसों को ज़िला अदालतों में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है। बार एसोसिएशन का तर्क है कि इससे हाई कोर्ट में 70% मुकदमेबाजी प्रभावित होगी और केवल संसद के पास अदालतों के अधिकार क्षेत्र बदलने की शक्ति है।
हड़ताल का मुख्य कारण: केस ट्रांसफर का प्रस्ताव
दिल्ली हाई कोर्ट के वकील एक बार फिर काम काज ठप कर हड़ताल पर चले गए हैं। यह विरोध प्रदर्शन फुल बेंच की उस सिफारिश के खिलाफ है, जिसमें दिल्ली की ज़िला अदालतों के लिए 'पेकुनिअरी ज्यूरिस्डिक्शन' (Pecuniary Jurisdiction) यानी मुकदमे की राशि के आधार पर अधिकार क्षेत्र को बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने का प्रस्ताव है। अभी यह सीमा ₹2 करोड़ है। इस बदलाव के बाद ज़िला अदालतें ₹10 करोड़ तक के सिविल और कमर्शियल मामलों की सुनवाई कर पाएंगी।
वकीलों के काम पर असर और चिंताएं
दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध कर रहा है। एसोसिएशन का कहना है कि इससे हाई कोर्ट से करीब 70% सिविल मुकदमे ज़िला अदालतों में चले जाएंगे। DHCBA के प्रेसिडेंट एन हरिहरन के मुताबिक, रियल एस्टेट जैसे कई मामलों का मूल्य ₹5 करोड़ से ₹10 करोड़ के बीच होता है। उन्होंने बताया कि प्रॉपर्टी की वैल्यूएशन कोर्ट फीस के लिए सर्कल रेट पर आधारित होती है, न कि मार्केट प्राइस पर। इसलिए, अगर यह प्रस्ताव लागू हुआ तो ऐसे ज्यादातर केस सीधे ज़िला अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आ जाएंगे, जिससे हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के काम पर गंभीर असर पड़ेगा।
अधिकार क्षेत्र और सलाह-मशविरे पर सवाल
बार एसोसिएशन की एक बड़ी शिकायत यह भी है कि इस निर्णय में पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया गया। वकीलों का आरोप है कि हाई कोर्ट ने ज़िला अदालतों के बार की मांगों को प्राथमिकता दी, लेकिन हाई कोर्ट बार की चिंताओं पर एक संयुक्त मंच पर ठीक से विचार नहीं किया गया। इसके अलावा, DHCBA ने इस प्रस्ताव के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाया है। एसोसिएशन का कहना है कि दिल्ली हाई कोर्ट एक्ट, 1966 के तहत अदालतों के अधिकार क्षेत्र में बदलाव करने की विधायी शक्ति केवल भारतीय संसद के पास है। हाई कोर्ट प्रशासनिक स्तर पर सिफारिशें कर सकता है, लेकिन बार का मानना है कि इसे कानून बनाने के लिए विधायी संशोधन (Legislative Amendment) की आवश्यकता होगी।
आगे क्या?
वकीलों के संगठन ने इस मामले में केंद्रीय कानून मंत्रालय से हस्तक्षेप की मांग की है। हालांकि, 10 जुलाई को रिपोर्ट पेश करने से रोकने के लिए एक पिछली कानूनी चुनौती खारिज कर दी गई थी, लेकिन अदालत ने तब माना था कि अंतिम अधिकार संसद के पास है। अब देखना यह है कि सरकार बार एसोसिएशन की मांगों पर विचार करती है या नहीं, और क्या इस केस वितरण पर संसदीय बहस होती है।
