पुरानी सरकारी नीतियों पर कोर्ट की कड़ी फटकार
दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकारी बाबुओं की उस कोशिश को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें वे कर्मचारियों के मेडिकल क्लेम के लिए 2002 की पुरानी दरों पर अड़े हुए थे। कोर्ट ने साफ कहा कि ये पुरानी दरें अब मेडिकल महंगाई के आगे टिक नहीं पातीं और इन्हें लागू करना संवैधानिक रूप से गलत है। कोर्ट ने 2006 में लिवर फेलियर के इलाज का भारी बिल झेलने वाले एक कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया।
मेडिकल खर्चों और सरकारी नियमों का टकराव
कोर्ट के सामने जो मामला आया, उसमें कर्मचारी का इलाज दिल्ली के प्रतिष्ठित सर गंगा राम अस्पताल में हुआ था, जिसका खर्च उस समय सरकारी नियमों के तहत मिलने वाले क्लेम से लगभग 40% ज्यादा था। कोर्ट ने इस मामले में आदेश दिया है कि कर्मचारी को बकाया ₹1,89,324 की पूरी रकम ब्याज सहित वापस की जाए। इस पर 6% का साधारण ब्याज भी देना होगा, अगर पहले कुछ पैसा रिकवर किया गया हो। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सरकारी खजाने को बचाने के चक्कर में कर्मचारियों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।
सरकारी अफसरों की मनमानी पर लगाम
सरकारी अफसरों ने कर्मचारी पर धोखाधड़ी के आरोप लगाकर क्लेम रोकने की कोशिश की थी, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह से नकार दिया। कोर्ट ने कहा कि पुरानी नीतियों से चिपके रहना और कर्मचारियों को उनके हक से वंचित करना गलत है। इस फैसले के बाद, सरकारी महकमों को अब मेडिकल क्लेम से जुड़े अपने नियमों को समय के साथ अपडेट करना होगा। अगर पुरानी दरों पर अड़े रहे, तो उन्हें भविष्य में ऐसे ही अदालती मामलों का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें उन्हें मोटा ब्याज भी चुकाना पड़ेगा।
भविष्य के लिए बड़ा सबक
यह फैसला सरकारी तंत्र के लिए एक बड़ा सबक है। अब उन्हें बजट बचाने के साथ-साथ कर्मचारियों को बेहतर मेडिकल सुविधाएं देने की जिम्मेदारी भी समझनी होगी। कोर्ट अब ऐसी पुरानी नीतियों को शक की निगाह से देखेगा, जो आज के मेडिकल खर्चों से मेल नहीं खातीं। इससे सरकारी कर्मचारियों को अपने इलाज के लिए बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
