अदालती फैसला और नियामक जोखिम
दिल्ली हाईकोर्ट ने L1 थोक शराब लाइसेंस देने से इनकार करके एक बड़ा संकेत दिया है। अदालत ने उत्पाद शुल्क आयुक्त (Excise Commissioner) के फैसले को बरकरार रखा है। इसका मतलब है कि अब किसी कंपनी को सजा होने के बाद ही लाइसेंस देने की बात नहीं होगी, बल्कि जांच के दायरे में आने पर भी लाइसेंस रोका जा सकता है। यह फैसला जांच के दायरे में आई कंपनियों के लिए एक मुश्किल स्थिति पैदा करता है।
बाजार में बढ़ेगी मुश्किलें
भारत दुनिया के सबसे बड़े शराब बाजारों में से एक है और Pernod Ricard जैसी बड़ी विदेशी कंपनियों के लिए यह बड़ा झटका है। Chivas Regal और Absolut जैसे प्रीमियम ब्रांड्स की सप्लाई के लिए कंपनी थोक वितरण (wholesale distribution) पर बहुत निर्भर करती है। दिल्ली में L1 लाइसेंस के बिना, कंपनी को यहां काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। इससे Diageo या स्थानीय कंपनियों को बाजार में अपनी पैठ बनाने का मौका मिल सकता है।
जांच का असर
2021 की उत्पाद शुल्क नीति (excise policy) के बाद से अंतरराष्ट्रीय शराब कंपनियों के लिए भारत का नियामक माहौल चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच कंपनी के लिए एक बड़ा खतरा है। निवेशकों को कंपनी के मूल्यांकन के साथ-साथ इस लंबे कानूनी जोखिम पर भी विचार करना होगा। जिस तरह से कंपनी के सह-आरोपियों को बरी किया गया है, उससे भी कोर्ट को मनाने में कंपनी सफल नहीं हो पाई। यह साफ दिखाता है कि उत्पाद शुल्क नीति और वित्तीय जांच के बीच का संबंध अभी भी कंपनी के लिए एक बड़ी बाधा है।
आगे की राह
बाजार की नजरें अब Pernod Ricard की अगली चाल पर होंगी। कंपनी ऊपरी अदालतों में अपील कर सकती है या अपने परिचालन मॉडल में बदलाव कर सकती है। फिलहाल, यह फैसला एक मिसाल कायम करता है कि संवेदनशील लाइसेंसिंग मामलों में प्रशासनिक सावधानी को 'निर्दोषिता का अनुमान' (presumption of innocence) से ऊपर रखा जा रहा है।
