दिल्ली हाई कोर्ट ने AI कंपनी OpenAI के खिलाफ ANI की कॉपीराइट याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि AI मॉडल को ट्रेन करने के लिए कॉपीराइटेड न्यूज़ कंटेंट का इस्तेमाल 'फेयर डीलिंग' के दायरे में आता है। इस ऐतिहासिक फैसले से अब भारतीय कानूनों के तहत निजी कंपनियां AI ट्रेनिंग के लिए डेटा का उपयोग कर सकेंगी।
AI के लिए 'फेयर डीलिंग' का विस्तार
तकनीक और मीडिया जगत के लिए यह एक बड़ी डेवलपमेंट है। दिल्ली हाई कोर्ट ने एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल (ANI) की उस अंतरिम राहत की मांग को खारिज कर दिया है, जिसमें AI डेवलपर OpenAI पर अपने ChatGPT मॉडल को ट्रेन करने के लिए ANI के कॉपीराइटेड आर्टिकल का अनधिकृत रूप से उपयोग करने का आरोप लगाया गया था। कोर्ट का फैसला है कि ऐसी गतिविधियां भारत के कॉपीराइट एक्ट, 1957 के 'फेयर डीलिंग' प्रावधान के तहत आती हैं। इससे AI फर्मों के लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा का उपयोग करके ट्रेनिंग जारी रखने का रास्ता साफ हो गया है।
कॉमर्शियल AI और 'फेयर डीलिंग'
कोर्ट ने माना कि AI ट्रेनिंग के लिए आर्टिकल की कॉपी करना तकनीकी रूप से 'पुनरुत्पादन' (reproduction) है। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी पाया कि यह उपयोग 'फेयर डीलिंग' के अपवाद (exception) के तहत सुरक्षित है। आम तौर पर, इस अपवाद को व्यक्तिगत शोध या अकादमिक उद्देश्यों के लिए सीमित माना जाता रहा है। लेकिन, इसे निजी कॉर्पोरेट संस्थाओं और कॉमर्शियल AI डेवलपमेंट के लिए विस्तारित करके, कोर्ट ने कई अन्य वैश्विक न्यायक्षेत्रों की तुलना में अधिक व्यापक व्याख्या अपनाई है। फैसले में यह भी कहा गया कि ChatGPT द्वारा उत्पन्न आउटपुट में ANI के स्वामित्व वाले विशिष्ट आर्टिकल से 'पर्याप्त समानता' (substantial similarity) नहीं दिखी।
बाज़ार और वित्तीय असर
यह फैसला भारत में AI कंपनियों के लिए एक अलग माहौल बनाता है, खासकर यूरोपीय संघ या यूनाइटेड किंगडम जैसे क्षेत्रों की तुलना में, जहां AI के लिए कॉपीराइट छूट अक्सर गैर-कॉमर्शियल या अकादमिक अनुसंधान तक सीमित होती है। कोर्ट का एक प्रमुख अवलोकन यह था कि ANI के मार्केट शेयर या सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू को कोई खास नुकसान नहीं हुआ। हालांकि, इस फैसले ने कंटेंट लाइसेंसिंग के भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज कर दी हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों, खासकर अमेरिका में, प्रमुख प्रकाशकों ने AI ट्रेनिंग अधिकारों के लिए लाइसेंसिंग डील हासिल की हैं, जिनका मूल्यांकन लगभग $3,113 प्रति वर्क तक पहुंच गया है। याचिका खारिज होने से यह संकेत मिलता है कि जब तक नया कानून नहीं बनता, तब तक भारतीय मीडिया कंपनियों के पास AI डेवलपर्स से स्वतः लाइसेंस शुल्क मांगने के कानूनी आधार सीमित हो सकते हैं।
विधायी सुधार की ओर कदम
चूंकि भारत के मौजूदा कॉपीराइट कानून जनरेटिव AI के उभरने से दशकों पहले लिखे गए थे, कोर्ट का फैसला एक ऐसी कमी को उजागर करता है जिसे कई कानूनी विशेषज्ञ केवल संसद द्वारा ही भरा जा सकता है। हालाँकि कोर्ट ने आधुनिक तकनीक को समायोजित करने के लिए मौजूदा अधिनियम की व्याख्या की है, लेकिन फैसले में विशेष, अद्यतन कानूनों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। सिंगापुर जैसे देशों ने कम्प्यूटेशनल डेटा विश्लेषण के लिए लक्षित अपवाद पेश किए हैं, जबकि यूरोपीय संघ ने टेक्स्ट और डेटा माइनिंग के लिए विशिष्ट नियम लागू किए हैं। भारतीय सांसद वर्तमान में घरेलू AI पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को सामग्री रचनाकारों के लिए उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित करने की आवश्यकता के साथ संतुलित करने के तरीके का मूल्यांकन कर रहे हैं। निवेशक और मीडिया संस्थाएं संभवतः भविष्य के नीति अपडेट या नए सरकारी नियमों पर नजर रखेंगी जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में लाइसेंसिंग और सामूहिक राजस्व-साझाकरण के लिए एक औपचारिक ढांचा स्थापित कर सकते हैं।
