दिल्ली हाई कोर्ट 16 जुलाई को यह तय करेगा कि सुप्रीम और हाई कोर्ट के जजों को मिलने वाले भत्ते नई टैक्स व्यवस्था के तहत टैक्सेबल (taxable) होंगे या नहीं। यह मामला CBDT के एक मेमोरेंडम को चुनौती देता है, जो इन लाभों पर टैक्स छूट को केवल पुरानी टैक्स व्यवस्था तक सीमित करता है। यह फैसला मौजूदा नियमों के तहत ज्यूडिशियल इनकम (judicial income) की गणना को स्पष्ट करेगा।
जजों के भत्तों पर टैक्स का बड़ा फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट 16 जुलाई को एक अहम फैसला सुनाने वाला है, जो सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट के जजों को मिलने वाले सरकारी भत्तों (statutory allowances) पर टैक्स के मसले को सुलझाएगा। इस मामले की जड़ें सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस (CBDT) के एक मेमोरेंडम में हैं, जिसे दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन (Delhi Tax Bar Association) ने चुनौती दी है। CBDT का कहना है कि जजों को मिलने वाले कुछ भत्ते, जो पहले टैक्स-फ्री माने जाते थे, अब नई इनकम-टैक्स व्यवस्था (new income-tax regime) अपनाने पर टैक्सेबल हो सकते हैं।
कानूनी पेच
यह विवाद जजों को मिलने वाली खास सुविधाओं जैसे कि किराया-मुक्त घर, यात्रा भत्ता, कन्वेयंस (conveyance) और समप्चरी अलाउंस (sumptuary allowances) से जुड़ा है। 1954 के हाई कोर्ट जजेज एक्ट (High Court Judges Act) और 1958 के सुप्रीम कोर्ट जजेज एक्ट (Supreme Court Judges Act) के तहत, इन सुविधाओं को जज की सैलरी का हिस्सा नहीं माना जाता था और इन पर टैक्स नहीं लगता था। दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन का तर्क है कि इन भत्तों को कभी भी टैक्सेबल सैलरी का हिस्सा नहीं माना गया, चाहे कोई भी टैक्स रिजीम (tax regime) चुनी जाए।
टैक्स विभाग की चिंता यह है कि नई टैक्स व्यवस्था, जिसमें टैक्स की दरें कम हैं और रिबेट (rebate) ज्यादा है, जजों को एक ऐसा टैक्स लाभ मिल सकता है जो दूसरे करदाताओं को उपलब्ध नहीं है। इसलिए, CBDT ने इन छूटों को केवल पुरानी टैक्स व्यवस्था तक सीमित कर दिया है। वहीं, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह व्याख्या जजों को संविधान के आर्टिकल 125 और 221 के तहत मिले विशेष अधिकारों का उल्लंघन करती है। इन आर्टिकल्स के अनुसार, जजों की नियुक्ति के बाद उनके भत्ते और सुविधाओं में कोई प्रतिकूल बदलाव नहीं किया जा सकता।
टैक्स फाइलिंग पर असर
यह मामला तब और अहम हो गया जब यह पाया गया कि मौजूदा इनकम-टैक्स फाइलिंग सिस्टम और TDS (Tax Deducted at Source) यूटिलिटीज में नई टैक्स व्यवस्था के तहत इन विशिष्ट वैधानिक छूटों (statutory exclusions) को रिपोर्ट करना आसान नहीं है। पहले की सुनवाई में, यह सुझाव दिया गया था कि जजों को इन राशियों को 'नॉट कंसीडर्ड एज इनकम' (not considered as income) के तौर पर वर्गीकृत करने की अनुमति दी जाए। लेकिन, समय की कमी और अन्य प्रक्रियात्मक कारणों से कोई अंतरिम राहत (interim relief) नहीं मिली, और अदालत अब अंतिम सुनवाई की ओर बढ़ रही है।
यह मामला कानूनी विशेषज्ञों और आम करदाताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैधानिक अधिकारों और आधुनिक टैक्स नीतियों के संगम को स्पष्ट करेगा। 16 जुलाई को अदालत का फैसला यह तय करेगा कि वर्तमान टैक्स ढांचे के तहत इसी तरह के अन्य वैधानिक भत्तों का क्या होगा, और यह भविष्य में ज्यूडिशियल पर्सनेल (judicial personnel) के लिए टैक्स अनुपालन (tax compliance) को भी प्रभावित कर सकता है।
