Judges को बड़ी राहत! Delhi HC ने CBDT के आदेश पर लगाई रोक, टैक्स से मिली छूट

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Judges को बड़ी राहत! Delhi HC ने CBDT के आदेश पर लगाई रोक, टैक्स से मिली छूट

दिल्ली हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए जजों के निवास और यात्रा भत्ते जैसे ऐलान्सेज पर टैक्स लगाने के CBDT के मेमोरेंडम पर रोक लगा दी है।

Detailed Coverage

जजों को मिली टैक्स में अंतरिम राहत

दिल्ली हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के लिए एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी कर जजों को उनके ऑफिशियल ऐलान्सेज (allowances) जैसे निवास, यात्रा और अन्य भत्तों पर टैक्स में छूट दी है। यह आदेश सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स (CBDT) के एक मेमोरेंडम के खिलाफ आया है, जिसमें कहा गया था कि अगर जज इनकम टैक्स एक्ट के नए टैक्स रिजीम (new tax regime) को चुनते हैं, तो इन भत्तों को टैक्सेबल (taxable) माना जाएगा।

ज्यूडिशियल एक्ट्स और इनकम टैक्स रूल्स के बीच टकराव

यह पूरा मामला इस बात पर टिका है कि क्या इनकम टैक्स के सामान्य नियम, जजों की सर्विस कंडीशन से जुड़े खास कानूनों को ओवरराइड (override) कर सकते हैं। हाई कोर्ट जजेज (सैलरीज एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) एक्ट 1954 और सुप्रीम कोर्ट जजेज (सैलरीज एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) एक्ट 1958 के तहत, कुछ ऐलान्सेज को टैक्स-फ्री (tax-exempt) स्टेटस दिया गया है। इन कानूनों का मकसद न्यायपालिका की फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस (financial independence) को बनाए रखना है।

दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन ने CBDT के इस मेमोरेंडम को कोर्ट में चुनौती दी थी। एसोसिएशन का तर्क था कि जजों को नए टैक्स रिजीम में जाने के लिए मजबूर करना और उनकी ऐलान्सेज पर टैक्स लगाना, ज्यूडिशियल इंडिपेंडेंस (judicial independence) को कमजोर करता है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ज्यूडिशियल ऐलान्सेज का खास स्टेटस कानून द्वारा सुरक्षित है और इसे नए टैक्स स्ट्रक्चर की शर्तों के अधीन नहीं किया जा सकता।

कोर्ट का टैक्स प्रोसेसिंग रोकने का आदेश

जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की बेंच ने यह ऑब्जर्व (observe) किया कि जजों की सैलरी से जुड़े कानून, इनकम टैक्स के सामान्य प्रावधानों पर प्राथमिकता रख सकते हैं। कोर्ट ने तत्काल उपाय के तौर पर, CBDT मेमोरेंडम से प्रभावित टैक्स रिटर्न की प्रोसेसिंग पर रोक लगा दी है। इससे जजों पर कोई तत्काल टैक्स देनदारी लागू नहीं होगी, जब तक कि इस मामले की विस्तृत न्यायिक समीक्षा (judicial review) नहीं हो जाती।

कानूनी और टैक्स प्रोफेशनल्स के लिए, यह केस विशेष वैधानिक छूटों (statutory exemptions) को हाल के वर्षों में पेश किए गए व्यापक, सरलीकृत नए टैक्स रिजीम के साथ एकीकृत करने की जटिलताओं को उजागर करता है। कोर्ट का मेमोरेंडम के कार्यान्वयन को रोकने का फैसला यह दर्शाता है कि इस कानूनी टकराव के लिए इन कानूनों के पदानुक्रम (hierarchy) की गहन जांच की आवश्यकता है। निवेशक और टैक्स ऑब्जर्वर (tax observers) अगली सुनवाई का इंतजार करेंगे कि क्या ये ज्यूडिशियल छूटें किसी भी टैक्सपेयर (taxpayer) द्वारा चुने गए टैक्स रिजीम की परवाह किए बिना सुरक्षित रहेंगी, जिसका परिणाम यह हो सकता है कि यह कैसे विशिष्ट विधायी छूटें सामान्य टैक्स सुधारों के साथ इंटरैक्ट (interact) करती हैं, इसका एक मिसाल कायम करे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.