दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) की गोपनीय फाइलों को दूसरे कानूनी मामलों में सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 42A का समर्थन करते हुए कहा है कि पार्टियों को कोर्ट में क्या पेश करना है, इसकी सीमाएं हैं। यह फैसला पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट से जुड़े Alstom Transport India और JPC Infrastructure के बीच के विवाद के चलते आया है।
मध्यस्थता की गोपनीयता पर दिल्ली HC का जोर
दिल्ली हाई कोर्ट ने आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) की कार्यवाही में गोपनीयता के महत्व को फिर से रेखांकित किया है। हालिया फैसले में, जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर ने कहा कि निजी मध्यस्थता कार्यवाही से जुड़े दस्तावेजों को असंबद्ध कानूनी विवादों में सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता। यह फैसला मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 42A के तहत मिलने वाले संरक्षण का समर्थन करता है, जिसे मध्यस्थता को एक निजी और सुरक्षित प्रक्रिया बनाए रखने के लिए लागू किया गया था।
मामला क्या था?
इस केस में Alstom Transport India Limited और JPC Infrastructure and Constructions Private Limited के बीच एक कॉन्ट्रैक्ट को लेकर विवाद था। यह मामला पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (Eastern Dedicated Freight Corridor) के लिए सब-कॉन्ट्रैक्टिंग (subcontracting) के काम से जुड़ा था, जिस पर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (DFCCIL) की निगरानी थी। Alstom को DFCCIL से इलेक्ट्रिफिकेशन और सिग्नलिंग का कॉन्ट्रैक्ट मिला था, जिसके बाद उन्होंने JPC को कुछ विशेष सिविल और इलेक्ट्रिकल काम के लिए हायर किया था।
प्रोजेक्ट की टाइमलाइन, साइट एक्सेस और कॉन्ट्रैक्ट टर्मिनेशन को लेकर हुए मतभेदों के बाद, दोनों पार्टियां मध्यस्थता के लिए गईं। इन कार्यवाही के दौरान, JPC Infrastructure ने Alstom द्वारा DFCCIL को लिखे गए एक पत्र को अपने दावों के समर्थन में सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की। यह पत्र Alstom और DFCCIL के बीच एक अलग मध्यस्थता प्रक्रिया का हिस्सा था। मध्यस्थता न्यायाधिकरण (arbitral tribunal), जिसमें पूर्व प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा भी शामिल थे, ने इस दस्तावेज को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि इसका उपयोग मूल कार्यवाही की गोपनीयता का उल्लंघन करेगा।
कोर्ट का फैसला
JPC Infrastructure ने इस फैसले को चुनौती देते हुए कहा था कि वह दस्तावेज प्रासंगिक है। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने इस चुनौती को खारिज कर दिया और न्यायाधिकरण के इनकार को बरकरार रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 42A का कानूनी उद्देश्य मध्यस्थता की गोपनीयता को सुरक्षित रखना है। यदि पार्टियां एक मामले के दस्तावेजों को दूसरे मामले में डालना शुरू कर दें, तो यह संरक्षण कमजोर होगा और मध्यस्थता में खुलकर बात करना मुश्किल हो जाएगा।
कोर्ट ने संस्थागत नियमों (institutional rules) और भारतीय कानून के बीच टकराव को भी संबोधित किया। JPC ने अपने पक्ष के समर्थन में इंटरनेशनल चैंबर ऑफ कॉमर्स (International Chamber of Commerce) के नियमों का सहारा लिया था, लेकिन कोर्ट ने कहा कि चूँकि मध्यस्थता का सीट (seat of arbitration) भारत में था, इसलिए स्थानीय मध्यस्थता अधिनियम को प्राथमिकता दी जाएगी। इस फैसले ने स्पष्ट किया कि संस्थागत नियम इस संदर्भ में संसदीय कानून को ओवरराइड नहीं कर सकते। नतीजतन, कोर्ट ने मध्यस्थता पुरस्कार (arbitral award) में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिससे विवाद से संबंधित प्रोजेक्ट लागत और खोए हुए मुनाफे पर JPC के दावों का प्रभावी रूप से अंत हो गया।
यह फैसला बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में शामिल कंपनियों के लिए एक रिमाइंडर है कि भारतीय अदालतें मध्यस्थता की गोपनीयता को सख्ती से लागू करती हैं। भविष्य में, कानूनी और कॉर्पोरेट टीमों के लिए यह एक अहम बात होगी कि यह मिसाल कैसे जटिल, बहु-पक्षीय निर्माण विवादों में साक्ष्य एकत्र करने के चरण को प्रभावित करेगी, खासकर जहां ओवरलैपिंग कॉन्ट्रैक्ट आम हैं।
