Delhi HC: संपत्ति की बढ़ती कीमतों को देखते हुए कोर्ट की लिमिट ₹2 करोड़ से ₹20 करोड़ हो सकती है

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Delhi HC: संपत्ति की बढ़ती कीमतों को देखते हुए कोर्ट की लिमिट ₹2 करोड़ से ₹20 करोड़ हो सकती है

दिल्ली हाई कोर्ट में जिला अदालतों के मुकदमों की सुनवाई की लिमिट बढ़ाने पर विचार चल रहा है। अभी जहां ₹2 करोड़ तक के केस जिला कोर्ट में सुने जाते हैं, वहीं इसे बढ़ाकर ₹20 करोड़ करने का प्रस्ताव है। प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतों के कारण छोटे-मोटे प्रॉपर्टी डिस्प्यूट्स भी हाई कोर्ट तक पहुंच रहे थे, जिससे कोर्ट पर बोझ बढ़ रहा था।

दिल्ली हाई कोर्ट में जिला अदालतों में सुने जाने वाले मुकदमों की लिमिट (pecuniary jurisdiction) बढ़ाने का प्रस्ताव विचाराधीन है। सात जजों की एक कमेटी इस पर गौर कर रही है कि क्या इस सीमा को मौजूदा ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़ किया जा सकता है।

प्रॉपर्टी की कीमतों का असर

इस कदम के पीछे मुख्य वजह राजधानी दिल्ली में प्रॉपर्टी की कीमतों में आई भारी तेजी है। हाई कोर्ट के जस्टिस अनिल क्षेतरपाल और जस्टिस तेजस करिया ने कहा कि प्रॉपर्टी की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण कई सामान्य प्रॉपर्टी के मामले भी ₹2 करोड़ की सीमा को पार कर रहे हैं। इसके चलते, बंटवारे, कब्जे या स्टे (injunction) जैसे छोटे-मोटे प्रॉपर्टी से जुड़े मामले भी सीधे हाई कोर्ट में पहुंच रहे हैं। यह स्थिति न्यायिक व्यवस्था के मूल ढांचे के खिलाफ है, जहाँ जिला अदालतों को स्थानीय विवादों को सुलझाने और हाई कोर्ट को अधिक गंभीर मामलों के लिए आरक्षित किया गया है।

हाई कोर्ट पर बोझ कम करने की कोशिश

इस बदलाव से हाई कोर्ट पर मुकदमों का प्रशासनिक बोझ कम होने की उम्मीद है। वर्तमान व्यवस्था में, अधिक मामलों के हाई कोर्ट पहुंचने से देरी होती है और लोगों का लिटिगेशन कॉस्ट (litigation cost) भी बढ़ जाता है, क्योंकि हाई कोर्ट की प्रक्रिया जिला अदालतों से ज्यादा जटिल होती है। ₹20 करोड़ तक के मामलों को जिला अदालतों में सुनवाई की अनुमति देने से केस मैनेजमेंट सुव्यवस्थित होगा और हाई कोर्ट उन मामलों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा जिनमें विशेष विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।

आगे क्या?

दिल्ली हाई कोर्ट का मौजूदा अधिकार क्षेत्र दिल्ली हाई कोर्ट एक्ट, 1966 के तहत आता है। हालांकि, लिमिट बढ़ाने जैसे बदलाव के लिए संसद से विधायी कार्रवाई (legislative action) की आवश्यकता होगी। जजों की कमेटी की समीक्षा इस प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है, जो आगे की कार्रवाई के लिए डेटा और सिफारिशें प्रदान करेगी। प्रॉपर्टी से जुड़े मामलों में पक्षकारों को अब कमेटी की रिपोर्ट और सरकार द्वारा उठाए जाने वाले अगले कदमों का इंतजार रहेगा।

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