दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि तलाक की डिक्री के खिलाफ अपील चलने के दौरान भी हिंदू मैरिज एक्ट के तहत गुजारा भत्ता (Interim Maintenance) जारी रहेगा। कोर्ट का यह फैसला ऐसे आश्रित जीवनसाथी के लिए बड़ी राहत है, जिन्हें कानूनी लड़ाई के दौरान वित्तीय मुश्किलों का सामना न करना पड़े।
कोर्ट का क्या है तर्क?
दिल्ली हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि कानूनी तौर पर अपील, मूल केस का ही एक हिस्सा होती है। जब तक अपील का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक केस पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता देने की ज़िम्मेदारी तब तक बनी रहेगी जब तक मामले का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता।
इस खास मामले में, एक फैमिली कोर्ट ने एक पति को उसकी ग्रॉस सैलरी का 30% बतौर गुजारा भत्ता पत्नी को देने का आदेश दिया था। जुलाई 2025 में तलाक की डिक्री मिलने के बाद पति ने दलील दी कि यह भुगतान अब बंद हो जाना चाहिए। लेकिन, हाई कोर्ट ने उसकी दलील खारिज कर दी और पति के एम्प्लॉयर को निर्देश दिया कि जब तक अपील का फैसला नहीं आ जाता, तब तक पत्नी को 30% सैलरी का भुगतान जारी रखा जाए।
पत्नी की कमाई की क्षमता पर दलीलें खारिज
सुनवाई के दौरान पति ने पत्नी की प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन और कमाई की क्षमता पर भी सवाल उठाए थे। उसने तर्क दिया था कि एक MBA ग्रेजुएट होने के नाते पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं मिलना चाहिए। हाई कोर्ट ने इन दलीलों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पत्नी की कमाई की क्षमता का आंकलन पहले ही किया जा चुका है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी व्यक्ति की कमाई की क्षमता होने का मतलब यह नहीं है कि वह गुजारा भत्ता पाने का हकदार नहीं होगा, खासकर तब जब वह वर्तमान में रोज़गार में न हो या आर्थिक रूप से स्वतंत्र न हो।
वित्तीय सुरक्षा पर असर
यह फैसला उन जीवनसाथियों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह देखा जा रहा है जो अपने पार्टनर पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर मामले में गुजारा भत्ता मिलना तय है, बल्कि यह कोर्ट के अधिकार को पुष्ट करता है कि वह अपील के दौरान ऐसे भत्ते को जारी रख सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी जीवनसाथी को लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान वित्तीय संसाधनों की कमी का सामना न करना पड़े। अपील के दौरान वित्तीय स्थिति को यथावत बनाए रखकर, कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि पैसों की कमी के कारण कोई भी पक्ष अपनी कानूनी लड़ाई लड़ने से वंचित न रह जाए। इस फैसले का सीधा असर यह होगा कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई भुगतान व्यवस्था तब तक जारी रहेगी जब तक हाई कोर्ट अपील पर अपना अंतिम फैसला नहीं सुना देता।
