दिल्ली हाईकोर्ट ने Zostel की एक और याचिका को खारिज कर दिया है। यह Zostel की Oyo की पेरेंट कंपनी PRISM के खिलाफ नौवीं असफल कानूनी कोशिश है। कोर्ट ने अपने पुराने रुख को दोहराते हुए कहा कि शुरुआती टर्म शीट (Term Sheet) बाध्यकारी नहीं थी, जबकि PRISM अपने IPO के लिए रेगुलेटरी फाइलिंग की ओर बढ़ रहा है।
Zostel की एक और कानूनी हार
दिल्ली हाईकोर्ट ने 8 जुलाई 2026 को एक अहम फैसला सुनाते हुए Zostel Hospitality की Oyo की पेरेंट कंपनी Oravel Stays (अब PRISM) के खिलाफ दायर एक नई याचिका को खारिज कर दिया है। यह Zostel की कई सालों से चल रहे इस कानूनी विवाद में नौवीं बार की असफलता है। इस मामले ने सुप्रीम कोर्ट और गुरुग्राम जिला कोर्ट सहित कई न्यायिक मंचों पर दस्तक दी है।
IPO की राह में बड़ा कदम
यह पूरा मामला एक असफल अधिग्रहण (Acquisition) की कोशिश से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत दोनों कंपनियों के बीच एक गैर-बाध्यकारी टर्म शीट पर हस्ताक्षर से हुई थी। Zostel का दावा रहा है कि उसने समझौते का अपना हिस्सा पूरा किया, जबकि PRISM का लगातार कहना है कि यह सिर्फ एक शुरुआती दस्तावेज था और कभी भी कानूनी रूप से बाध्यकारी करार नहीं बना।
जैसे-जैसे PRISM अपने प्रस्तावित इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के लिए रेगुलेटरी प्रक्रियाओं में आगे बढ़ रहा है, कंपनी ने अपनी पब्लिक फाइलिंग में इस चल रहे मुकदमे का पूरा ब्योरा दिया है। कोर्ट का यह ताजा फैसला इसी बात को पुख्ता करता है कि जब तक जरूरी व्यावसायिक शर्तों पर कोई अंतिम समझौता नहीं होता, तब तक विशिष्ट प्रदर्शन (Specific Performance) का अनुरोध लागू नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का अहम फैसला
कानूनी जानकारों का कहना है कि दिल्ली हाईकोर्ट इससे पहले मई 2025 में इस मामले से जुड़े एक अहम आर्बिट्रल अवार्ड को भी अमान्य कर चुका था। उस फैसले में कोर्ट ने माना था कि टर्म शीट में कॉन्ट्रैक्ट लॉ और पब्लिक पॉलिसी के तहत जरूरी बाध्यकारी तत्व गायब थे। मौजूदा याचिका को खारिज करके, कोर्ट ने इन पुराने मुद्दों को फिर से उठाने की कोशिश को निराधार बताया है।
सुनवाई के दौरान Zostel के वकीलों ने साफ किया कि उनका मकसद IPO प्रक्रिया को रोकना नहीं, बल्कि कथित अधिकारों को जताना था। हालांकि, लगातार आ रहे न्यायिक फैसले इस बात को दर्शाते हैं कि शुरुआती दस्तावेजों के आधार पर दावे लागू करवाना कितना मुश्किल है, खासकर जब उनमें स्पष्ट और बाध्यकारी शर्तें न हों।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
बाजार विश्लेषकों और संभावित निवेशकों के लिए, अब मुख्य फोकस PRISM के IPO की प्रगति पर रहेगा। कोर्ट के इस हालिया फैसले से इस विशेष विवाद से जुड़ी कानूनी बाधाएं काफी हद तक दूर हो गई हैं, ऐसे में कंपनी की तरफ से रेगुलेटरी खुलासों को साफ-सुथरा रखना एक अहम पहलू होगा। इस लंबे समय से चले आ रहे कानूनी मतभेद का समाधान कंपनी के लिए पब्लिक मार्केट में कदम रखने की अंतिम जरूरतों को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। निवेशक अब IPO की समय-सीमा, SEBI से मिलने वाली मंजूरी और कंपनी द्वारा बाजार में डेब्यू की तैयारी के लिए उठाए जाने वाले अंतिम कदमों से जुड़ी अपडेट्स पर नजर रखेंगे।
