दिल्ली की एक अदालत ने पुलिस कमिश्नर को आदेश दिया है कि वे आपराधिक रिकॉर्ड को ठीक करें। अदालत ने पाया कि एक व्यक्ति को 17 मामलों में गलत तरीके से फंसाया गया था। कोर्ट ने कहा कि अजय राठी नाम के इस शख्स को बिना किसी सबूत या गिरफ्तारी के ई-एफआईआर (e-FIRs) में गलत तरीके से शामिल किया गया था। यह फैसला जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें पुलिस के डेटा की सटीकता पर सवाल उठाए गए थे।
पुलिस की गलती या जानबूझकर? कोर्ट ने जताई चिंता
दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को उनके आपराधिक रिकॉर्ड रखने के सिस्टम में सुधार लाने का कड़ा निर्देश दिया है। यह आदेश अजय राठी की जमानत अर्जी की न्यायिक समीक्षा के बाद आया है, जिन पर कई आपराधिक मामलों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था।
क्या थी गड़बड़ी?
साकेत जिला अदालत में हुई सुनवाई के दौरान, एडिशनल सेशन जज सोनू अग्निहोत्री ने पुलिस द्वारा पेश किए गए डेटा की जांच की और आरोपी के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या में बड़ी खामियां पाईं। पुलिस के शुरुआती रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी 36 अलग-अलग मामलों में शामिल था, लेकिन कोर्ट के आदेश पर हुई गहन जांच में यह बात सामने आई कि वह असल में सिर्फ पांच मामलों में ही शामिल था।
कोर्ट ने खासतौर पर इस बात पर जोर दिया कि 2017 में दर्ज की गई 17 ई-एफआईआर (e-FIRs) में आरोपी को गलत तरीके से फंसाया गया था। जज ने यह साफ किया कि किसी व्यक्ति को कानूनी तौर पर किसी मामले में शामिल नहीं माना जा सकता, अगर उसे उस खास एफआईआर (FIR) के संबंध में गिरफ्तार नहीं किया गया हो या आरोप नहीं लगाया गया हो। इसके बाद, कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को ऐसे errores को भविष्य में होने से रोकने के लिए सुधारात्मक कदम उठाने का आदेश दिया, क्योंकि गलत डेटा के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
जमानत याचिका और बचाव पक्ष की दलीलें
यह जमानत अर्जी मैदानगढ़ी पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले से संबंधित थी, जो एक पारिवारिक विवाद से जुड़ा हुआ प्रतीत हो रहा था। बचाव पक्ष ने दलील दी कि चोरी जैसे आरोपों को राठी के प्रॉपर्टी अधिकारों को बाधित करने के लिए गढ़ा गया था। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने आरोपी और एक स्थानीय पुलिस अधिकारी के बीच संभावित टकराव को लेकर भी चिंता जताई थी।
हालांकि अभियोजन पक्ष ने अपने मामले का समर्थन करने के लिए सीसीटीवी (CCTV) सबूत पेश किए, लेकिन कोर्ट ने माना कि 17 झूठी ई-एफआईआर (e-FIRs) के खुलासे से पुलिस के समग्र रिकॉर्ड-कीपिंग की विश्वसनीयता कमजोर हो गई थी।
कोर्ट का फैसला
नियमित जमानत देने का फैसला सुनाते हुए, कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि उसी एफआईआर (FIR) में नामजद अन्य आरोपियों को पहले ही राहत मिल चुकी थी। होटल रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज जैसे सबूतों ने सह-आरोपियों के लिए 'अलीबी' (alibis) का समर्थन किया था। पुलिस रिपोर्टों में विसंगतियों और अन्य शामिल लोगों की जमानत की स्थिति को देखते हुए, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हिरासत जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। अब यह देखना होगा कि पुलिस विभाग कोर्ट के इस निर्देश पर कैसी प्रतिक्रिया देता है और रिकॉर्ड के सत्यापन व रखरखाव के लिए आंतरिक प्रक्रिया में क्या बदलाव लाता है।
