कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से कोलकाता के स्कूलों में मिड-डे मील (Mid-Day Meal) तैयार करने में ISKCON को शामिल करने के प्रस्ताव पर स्पष्टीकरण मांगा है। सरकार का कहना है कि यह अभी सिर्फ एक प्रस्ताव है, लेकिन कोर्ट स्थानीय स्वयं सहायता समूहों पर पड़ने वाले प्रभाव और सरकारी योजनाओं से जुड़े संवैधानिक दिशानिर्देशों पर चिंता जता रहा है।
ISKCON की मिड-डे मील योजना पर कोर्ट का दखल
कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को एक एफिडेविट (Affidavit) फाइल करने का निर्देश दिया है। इसमें सरकार को यह साफ करना होगा कि कोलकाता के स्कूलों में मिड-डे मील (Mid-Day Meal) तैयार करने और बांटने की जिम्मेदारी इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) को सौंपने के प्रस्ताव पर क्या स्थिति है। एक्टिंग चीफ जस्टिस तापब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस पार्थ सारथी चटर्जी की डिवीज़न बेंच ने यह फैसला PM POSHAN योजना के तहत इस बदलाव को लागू करने की प्रक्रिया पर दायर की गई कानूनी चुनौती के बाद लिया है।
याचिकाकर्ता, वकील सिरसण्य बंदोपाध्याय के ज़रिए, ने दलील दी कि बिना औपचारिक पब्लिक प्रोक्योरमेंट (Public Procurement) के किसी खास संगठन को यह ज़िम्मेदारी सौंपना संवैधानिक और वैधानिक नियमों का उल्लंघन हो सकता है। याचिका में सरकारी सहायता से चलने वाले कल्याणकारी कार्यक्रमों की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति और बच्चों के पोषण संबंधी विकल्पों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव पर भी सवाल उठाए गए हैं।
स्थानीय आजीविका और खरीद पर असर
याचिका में एक मुख्य चिंता उन हज़ारों स्वयं सहायता समूहों (Self-Help Groups) और सामुदायिक संगठनों के बारे में उठाई गई है, जो वर्तमान में कोलकाता में मिड-डे मील किचन चला रहे हैं। इन समूहों को डर है कि ISKCON द्वारा प्रबंधित एक सेंट्रलाइज्ड किचन मॉडल (Centralized Kitchen Model) में बदलाव से उनकी आजीविका खतरे में पड़ सकती है। कोर्ट ने इन चिंताओं को स्वीकार किया और कहा कि इन स्थानीय समूहों की भागीदारी एक महत्वपूर्ण कारक है जिस पर सरकार को अपने आधिकारिक जवाब में ध्यान देना होगा।
सरकार का रुख और कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट के समक्ष एडवोकेट जनरल सुजीत नाथ मित्रा ने स्पष्ट किया कि सरकार ने अभी तक इस बदलाव को लागू करने के लिए कोई औपचारिक अधिसूचना (Formal Notification) जारी नहीं की है और न ही कोई ठोस कदम उठाए हैं। उन्होंने इस स्थिति को एक अंतिम निर्णय के बजाय विचाराधीन प्रस्ताव बताया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि चूंकि कोई आधिकारिक सरकारी आदेश नहीं है, इसलिए यह कानूनी चुनौती फिलहाल समय से पहले (Premature) लगती है। हालांकि, बेंच ने मामले को खुला रखने की अनुमति दी, यह देखते हुए कि यदि कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी होती है तो पक्षकार कोर्ट में वापस आ सकते हैं।
राज्य के कल्याणकारी इंफ्रास्ट्रक्चर में रुचि रखने वाले हितधारकों और निवेशकों के लिए, राज्य सरकार का आधिकारिक एफिडेविट (Official Affidavit) ही मुख्य देखने लायक चीज़ होगी। निवेशक और पर्यवेक्षक इस बात पर नज़र रखेंगे कि क्या सरकार सेंट्रलाइज्ड किचन मॉडल के साथ आगे बढ़ती है या स्थानीय स्वयं सहायता समूहों को शामिल करते हुए मौजूदा विकेन्द्रीकृत प्रणाली (Decentralized System) को बनाए रखती है। अंतिम निर्णय राज्य के शिक्षा कल्याण क्षेत्र में खरीद अनुबंधों (Procurement Contracts) के भविष्य और सामुदायिक संगठनों द्वारा प्रबंधित मौजूदा सप्लाई चेन की स्थिरता को निर्धारित करेगा।
