Mead Johnson के पूर्व MD को बड़ी राहत! कलकत्ता HC ने रद्द की केस, जानें वजह

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AuthorAditya Rao|Published at:
Mead Johnson के पूर्व MD को बड़ी राहत! कलकत्ता HC ने रद्द की केस, जानें वजह

कलकत्ता हाई कोर्ट ने Mead Johnson India के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) शैलेश वेंकटेशन के खिलाफ 2015 के एक मामले में क्रिमिनल केस को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि कंपनी का नाम लिए बिना डायरेक्टर्स पर IPC के तहत केस नहीं चलाया जा सकता। इस फैसले से लंबे समय से चले आ रहे कानूनी बोझ से मुक्ति मिली है।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने Mead Johnson India के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) शैलेश वेंकटेशन के खिलाफ दर्ज क्रिमिनल केस को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया है। यह मामला नवंबर 2015 में Enfamil A+ Stage 3 बेबी फॉर्मूला के एक डिब्बे में कथित तौर पर कीड़ा पाए जाने की प्राइवेट शिकायत से जुड़ा था। हाई कोर्ट के इस फैसले ने कानूनी कार्यवाही को समाप्त कर दिया है, जिसमें केस को संभालने में हुई महत्वपूर्ण कानूनी और प्रक्रियात्मक खामियों का हवाला दिया गया है।

डायरेक्टर्स की लायबिलिटी पर कानूनी तर्क

जस्टिस चैताली चटर्जी दास ने कॉर्पोरेट जवाबदेही पर एक स्पष्ट फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तहत, कॉर्पोरेट डायरेक्टर्स कंपनी के कार्यों के लिए स्वतः (vicariously) उत्तरदायी नहीं ठहराए जा सकते, जब तक कि कोई विशेष वैधानिक प्रावधान न हो। इस फैसले का एक मुख्य आधार यह था कि फाइनल चार्जशीट में कंपनी को ही आरोपी नहीं बनाया गया था। कॉर्पोरेट इकाई को बाहर रखने से, अभियोजन पक्ष किसी भी व्यक्तिगत डायरेक्टर को कथित गुणवत्ता समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराने का आधार स्थापित करने में विफल रहा।

प्रक्रियात्मक खामियां और वैधानिक टकराव

कोर्ट ने जांच के दौरान हुई बड़ी प्रक्रियात्मक खामियों की ओर भी इशारा किया। जबकि मूल FIR में कंपनी और एक फार्मेसी दोनों का नाम था, पुलिस ने सितंबर 2021 में एक चार्जशीट दायर की जिसमें केवल पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर को आरोपी के तौर पर पहचाना गया। हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने भारतीय दंड संहिता के सामान्य प्रावधानों का उपयोग करके अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भोजन-संबंधी गुणवत्ता की शिकायतें 2006 के विशेष खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम (Food Safety and Standards Act - FSS Act) के अंतर्गत आती हैं, जो ऐसे मामलों की जांच और अभियोजन के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश प्रदान करता है। इन मामलों को सामान्य क्रिमिनल शिकायतों के बजाय अधिकृत अधिकारियों द्वारा संभाला जाना चाहिए।

देरी का कानूनी प्रक्रिया पर असर

लायबिलिटी के मुद्दों से परे, कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि कार्यवाही में अत्यधिक देरी हुई। 2015 की मूल घटना के छह साल बाद चार्जशीट दायर की गई थी, जिसे कोर्ट ने FSS Act की धारा 77 के तहत समय-बाह्य (time-barred) माना। यह धारा किसी घटना के एक साल के भीतर अपराधों पर संज्ञान लेने की समय सीमा तय करती है। इस देरी के कारण गंभीर पूर्वाग्रह हुआ, क्योंकि इन्फेंट फॉर्मूला की एक्सपायरी डेट बहुत पहले निकल चुकी थी, जिससे मूल शिकायत को सत्यापित करने के लिए प्रयोगशाला में दोबारा परीक्षण करना असंभव हो गया था। इन कारकों को देखते हुए, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मामले को जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और FIR, चार्जशीट और सभी संबंधित समन को रद्द करने का आदेश दिया।

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