यह फैसला बताता है कि कैसे जांच अधिकारी अक्सर सेक्शन 67 के तहत दर्ज इकबालिया बयानों पर बहुत ज्यादा निर्भर करते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 'तोफान सिंह' केस में इन्हें अमान्य करार दिया था। इसके बावजूद, ऐसे कई मामले चलते रहते हैं, जिनमें पुख्ता सबूतों की कमी होती है। इससे आरोपी सालों तक जेल में बंद रहते हैं, जो उन्हें सजा से भी बदतर लगता है।
भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा विचाराधीन कैदी हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, 75% से ज्यादा कैदी फैसले का इंतजार कर रहे हैं। NDPS एक्ट इसमें बड़ा योगदान देता है, क्योंकि इसके तहत जमानत की शर्तें (सेक्शन 37) बहुत सख्त हैं और न्यूनतम सजा का प्रावधान है। इस कानून की वजह से मामला मजबूत न होने पर भी जेल से बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है।
कई राज्य भले ही अपने 'कन्विक्टन रेट' (सजा दिलाने की दर) का दावा करें, लेकिन ये आंकड़े अटके हुए मामलों और विचाराधीन कैदियों की बड़ी संख्या को छुपाते हैं। उदाहरण के तौर पर, पंजाब में जहां 'कन्विक्टन रेट' हाई है, वहीं 82% से ज्यादा कैदी विचाराधीन हैं, जिनमें ज्यादातर NDPS मामलों के हैं।
लंबे कानूनी मुकाबलों से एक और बड़ी असमानता सामने आती है। अमीर लोग सालों तक केस लड़ सकते हैं, जैसे 'रामलाल केस' में हुआ। वहीं, गरीब लोग ऐसा नहीं कर पाते और अनिश्चित काल तक जेल में रहते हैं। यह स्थिति कानून के समक्ष समानता (Article 14) के वादे पर सवाल उठाती है। कई बार जमानत मिलने के बावजूद लोग जेल में रह जाते हैं क्योंकि वे भारी 'श्योरिटी' (जमानत की गारंटी) की शर्तें पूरी नहीं कर पाते, जिसमें अक्सर स्थानीय संपत्ति की जरूरत होती है। कोर्ट के पुराने फैसले, जो जमानत के लिए यथार्थवादी तरीकों पर जोर देते हैं, अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।
