अनिवार्य समावेश की ओर बढ़ता कदम
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत के इस ऐलान से साफ है कि अब कानूनी पेशे में महिलाओं की नुमाइंदगी बढ़ाने के लिए सिर्फ नीतियों की वकालत नहीं, बल्कि ठोस संस्थागत बदलाव किए जाएंगे। खास तौर पर सरकारी वकील और लॉ ऑफिसर की नियुक्ति प्रक्रिया को टारगेट करके, ज्यूडिशियरी महिला वकीलों के लिए एक मजबूत आर्थिक और प्रोफेशनल आधार बनाने की कोशिश कर रही है। यह इस बात को दर्शाता है कि सिर्फ लॉ स्कूल से पास होने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ाना काफी नहीं है, अगर उनका करियर प्राइवेट और पब्लिक प्रैक्टिस में टिकाऊ न रहे। इस नए फ्रेमवर्क का मकसद उन ढांचागत दिक्कतों को दूर करना है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से महिला वकीलों को सीनियर काउंसल के पदों पर पीछे रखा है। इसे कानूनी व्यवस्था के लिए डायवर्सिटी (Diversity) को एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन इंडिकेटर (Performance Indicator) की तरह देखा जा रहा है।
ज्यूडिशियरी की सफलताओं से सीख
अंदरूनी आंकड़ों के मुताबिक, ज्यूडिशियरी ने अपने दायरे में वो सफलता हासिल की है जहाँ प्राइवेट बार (Private Bar) को संघर्ष करना पड़ा है। कुछ इलाकों में डिस्ट्रिक्ट ज्यूडिशियरी में महिलाओं की भागीदारी लगभग 48% के करीब पहुंच गई है। अब इसी मॉडल को बार काउंसिल में लागू करने की तैयारी है। ऐतिहासिक रूप से, करियर के बीच के दौर में संस्थागत सपोर्ट की कमी के कारण प्रतिभाओं का प्रवाह बाधित रहा है। पंजाब और हरियाणा में पिछली भर्ती परीक्षाओं की सफलता, जहाँ कम समय में महिला ज्यूडिशियल ऑफिसर्स की संख्या लगभग दोगुनी हो गई थी, इस नए फैसले के लिए एक ब्लूप्रिंट का काम करेगी। इन प्रशासनिक रास्तों का इस्तेमाल करके, सुप्रीम कोर्ट उन बार काउंसिलों पर दबाव बनाने की स्थिति में है जिन्होंने पहले आंतरिक सुधारों का विरोध किया था।
अटके पड़े केसों का ऑपरेशनल रिस्क (Operational Risk)
डायवर्सिटी (Diversity) के अलावा, कानूनी पेशे में सुधार का यह बड़ा कदम केस पेंडेंसी (Case Pendency) के व्यापक संकट से भी जुड़ा हुआ है। आलोचक अक्सर कमर्शियल डिस्प्यूट्स (Commercial Disputes) के धीमे समाधान को भारत में संस्थागत निवेश के लिए एक बड़ी बाधा मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट में 38 जजों की लक्षित संख्या की ओर बढ़ने के साथ, ध्यान प्रोसीजरल कंसॉलिडेशन (Procedural Consolidation) के जरिए एफिशिएंसी (Efficiency) बढ़ाने पर है। मामलों को ग्रुप करने और मेडिएशन (Mediation) को प्राथमिकता देने जैसी प्रथाओं से कोर्ट के डोकेट (Docket) पर दबाव कम होने की उम्मीद है। हालांकि, इन प्रशासनिक सुधारों पर संदेह करने वाले भी हैं, जो बैकलॉग (Backlog) को न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Judicial Infrastructure) की कमी का लक्षण मानते हैं, जिसे सिर्फ पॉलिसी के जरिए हल नहीं किया जा सकता।
लागू करने में ढांचागत कमजोरी का खतरा
भले ही महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने का फैसला प्रगतिशील हो, इसे लागू करने में कई बड़ी चुनौतियां हैं। विभिन्न बार एसोसिएशन्स (Bar Associations) की स्वायत्त प्रकृति एक बिखरा हुआ परिदृश्य बनाती है जहाँ राष्ट्रीय निर्देशों को अक्सर स्थानीय कानूनी निकायों द्वारा नजरअंदाज या लटका दिया जाता है। इसके अलावा, यह खतरा भी है कि सिर्फ को’टे (Quotas) होने और योग्यता-आधारित सपोर्ट मैकेनिज्म (Merit-based Support Mechanisms) न होने से यह सिर्फ दिखावा बनकर रह सकता है, न कि वास्तविक ढांचागत एकीकरण। सबसे बड़ा खतरा यह है कि बार पर ज्यूडिशियरी के इस फोकस को प्राइवेट-सेक्टर लीगल प्रैक्टिस (Private-sector Legal Practice) में अनिवार्य आरक्षण की संवैधानिकता को लेकर कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे कोर्ट और कानूनी बिरादरी के बीच एक लंबा संघर्ष छिड़ सकता है।
