रेगुलेटरी सख्ती की ओर फ्यूल रिटेल सेक्टर
मद्रास हाई कोर्ट ने इस मामले को राज्य पुलिस की जांच पर चिंता जताते हुए सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को सौंप दिया है। कोर्ट का मानना था कि राज्य के क्राइम ब्रांच-क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CB-CID) ने केवल फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों पर ध्यान केंद्रित किया, लेकिन उन लाभार्थियों की भूमिका पर पर्याप्त जांच नहीं की, जिन्होंने इन फर्जी NOCs के लिए कथित तौर पर मोटी रकम चुकाई थी।
90 से ज़्यादा फर्जी मामलों का खुलासा
इस तरह के 90 से ज़्यादा फर्जी NOC मामलों की पहचान हो चुकी है, जो लाइसेंसिंग प्रक्रिया की अखंडता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। बता दें कि पेट्रोल पंप के लाइसेंस के लिए जिलाधिकारियों, पुलिस से NOCs के साथ-साथ पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (PESO) का लाइसेंस भी ज़रूरी होता है। कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया में खामियों का फायदा उठाते हुए ज़रूरी निरीक्षणों को दरकिनार किया गया होगा। इस CBI जांच से ऐसे प्रमाण पत्रों पर जारी किए गए लाइसेंस की विस्तृत समीक्षा की उम्मीद है, जिसके चलते कुछ पेट्रोल पंप आउटलेट बंद या सील भी किए जा सकते हैं, जिससे सेक्टर में अनिश्चितता का माहौल है।
प्रमुख कंपनियों पर बढ़ी जांच
भारत का फ्यूल रिटेल मार्केट, जिसमें इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी सरकारी तेल कंपनियों (PSUs) के साथ-साथ नायरा एनर्जी और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसे प्राइवेट प्लेयर भी शामिल हैं, अब ज़्यादा जांच के दायरे में आ गया है। IOCL अकेले 35,500 से ज़्यादा पेट्रोल पंप आउटलेट चलाता है, जबकि सभी PSUs मिलकर 77,000 से ज़्यादा पेट्रोल पंप ऑपरेट करते हैं।
2020 से चल रहा था रैकेट?
यह जांच एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) के बाद शुरू हुई है, जिसमें इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और नायरा एनर्जी का भी नाम है। इस रैकेट का खुलासा करीब 2020 में होना शुरू हुआ था, जिससे यह पता चलता है कि नियमों की खामियों का फायदा कब से उठाया जा रहा था।
क्या हैं आगे के मायने?
मद्रास हाई कोर्ट के खुलासे ने फ्यूल रिटेल लाइसेंसिंग ढांचे में एक गंभीर गवर्नेंस रिस्क (governance risk) को उजागर किया है। जिन लोगों ने कथित तौर पर फर्जी NOCs के लिए बड़ी रकम दी, उन पर कार्रवाई न होने से रेगुलेटरी प्रोटोकॉल को दरकिनार करने की गुंजाइश साफ दिखती है। इससे कई पेट्रोल पंपों के लाइसेंस रद्द हो सकते हैं, जिससे ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के रेवेन्यू पर असर पड़ने की आशंका है। CBI जांच से फ्यूल रिटेलिंग के लिए रेगुलेटरी माहौल और सख्त होने की उम्मीद है। NOC और लाइसेंस आवेदन प्रक्रियाओं में ज़्यादा ड्यू डिलिजेंस (due diligence) की उम्मीद है, जिससे नए आउटलेट की मंजूरी में ज़्यादा समय लग सकता है। सभी कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे पूरी तरह से नियमों का पालन कर रही हैं, ताकि निवेशकों का भरोसा बना रहे।