तरुण तेजपाल केस: बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित, 'माफी वाले ईमेल' पर टिकी निगाहें

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
तरुण तेजपाल केस: बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित, 'माफी वाले ईमेल' पर टिकी निगाहें

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पत्रकार तरुण तेजपाल को 2013 में यौन उत्पीड़न के एक मामले में मिली बरी की सजा के खिलाफ गोवा सरकार की अपील पर सुनवाई पूरी कर ली है। कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस मामले में आरोपी द्वारा भेजे गए 'माफी वाले ईमेल' की व्याख्या महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

केस का निचोड़: क्या माफी मांगना गुनाह कबूलना है?

गोवा बेंच, जिसमें जस्टिस डॉ. नीला गोखले और जस्टिस अमित जमसंडेकर शामिल थे, यह तय करेगी कि क्या निचली अदालत के बरी करने के फैसले को सबूतों के आधार पर पलटने की जरूरत है।

सबूतों और आचरण पर कानूनी बहस

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो अभियोजन पक्ष का नेतृत्व कर रहे थे, ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के आघात (trauma) पर प्रतिक्रिया करने के विभिन्न तरीकों को ध्यान में नहीं रखा। मेहता का कहना था कि निचली अदालत ने घटना के बाद शिकायतकर्ता के पेशेवर आचरण पर अत्यधिक महत्व दिया और उसकी गवाही में विसंगतियों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया। अभियोजन पक्ष का कहना है कि तेहेलका (Tehelka) के प्रबंधन को घटना की रिपोर्ट करना शिकायतकर्ता का एक महत्वपूर्ण कदम था, जिस पर निचली अदालत ने पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया।

'माफी वाले ईमेल' की अहमियत

हाई कोर्ट की कार्यवाही का एक बड़ा हिस्सा तरुण तेजपाल द्वारा भेजे गए एक ईमेल की व्याख्या पर केंद्रित रहा। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि पत्र-व्यवहार में इस्तेमाल की गई भाषा - विशेष रूप से 'चूक' (lapse of judgment), शर्मिंदगी और घटना की स्वीकारोक्ति जैसे शब्दों का इस्तेमाल - स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि एक शारीरिक घटना हुई थी। सरकारी वकील ने ऐसे बयानों के पीछे के तर्क पर सवाल उठाया, यदि बचाव पक्ष के दावे के अनुसार कोई घटना हुई ही नहीं थी।

इसके जवाब में, वरिष्ठ वकील आबाद पोंडा, जो बचाव पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, ने कहा कि ईमेल की गलत व्याख्या की जा रही है। बचाव पक्ष का तर्क था कि संदेशों का संबंध एफआईआर (FIR) में लगाए गए गैर-सहमति वाले शारीरिक कृत्य के बजाय केवल एक 'क्षणिक सहमतिपूर्ण मुलाकात' (fleeting consensual encounter) या मौखिक आदान-प्रदान से था। पोंडा ने अभियोजन पक्ष की गवाह शोमा चौधरी (Shoma Chaudhury) की गवाही का हवाला देते हुए कहा कि वर्णित घटना सीमित प्रकृति की थी। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता की उस समय की प्रतिक्रिया भी ईमेल को यौन उत्पीड़न की स्वीकारोक्ति के रूप में नहीं दर्शाती थी।

अदालत का अंतिम आदेश इस लंबे कानूनी मामले में अगले कदमों को तय करेगा।

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