Tata Sons को बड़ी राहत! बॉम्बे हाई कोर्ट ने ₹1524 Cr GST डिमांड पर लगाई रोक

LAWCOURT
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Tata Sons को बड़ी राहत! बॉम्बे हाई कोर्ट ने ₹1524 Cr GST डिमांड पर लगाई रोक
Overview

Tata Sons लिमिटेड के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट से बड़ी खबर आई है। कोर्ट ने कंपनी के खिलाफ ₹1,524 करोड़ की गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) डिमांड और पेनल्टी को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि विदेशी आर्बिट्रेशन अवॉर्ड्स (Arbitration Awards) के निपटान के लिए किया गया भुगतान, अगर किसी कोर्ट के आदेश को पूरा करने से जुड़ा है, न कि किसी अलग सर्विस एग्रीमेंट (Service Agreement) से, तो वह 'सर्विस सप्लाई' के तहत GST के दायरे में नहीं आएगा।

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कोर्ट का बड़ा फैसला, Tata Sons को मिली राहत

बॉम्बे हाई कोर्ट ने Tata Sons के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए, ₹1,524 करोड़ के GST डिमांड नोटिस को खारिज कर दिया है। कोर्ट का मानना है कि जब किसी आर्बिट्रेशन अवॉर्ड (Arbitration Award) के सेटलमेंट के लिए भुगतान किया जाता है और यह भुगतान किसी कोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए होता है, न कि किसी विशिष्ट सेवा (Service) के बदले, तो इसे 'सर्विस सप्लाई' मानकर उस पर GST लगाना सही नहीं है। यह फैसला Tata Sons को बड़ी राहत देने के साथ-साथ भारत की कई अन्य कंपनियों के लिए भी एक मिसाल कायम करेगा जो ऐसे विवादों का सामना करती हैं।

टैक्स अथॉरिटी की दलील और कोर्ट का जवाब

टैक्स अथॉरिटीज ने NTT Docomo के साथ हुए समझौते का हवाला देते हुए इस भुगतान को टैक्सेबल (Taxable) बताने की कोशिश की थी। उनका तर्क था कि Docomo ने केस वापस लेने पर सहमति जताई थी, जिसे वे 'किसी कार्य को सहन करना' (Tolerating an act) मानकर GST के दायरे में ला रहे थे। लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को 'बेतुका' (Absurd) करार दिया और कहा कि यह भुगतान किसी सेवा के बदले नहीं, बल्कि एक सुलझे हुए अवॉर्ड (Award) का नतीजा था।

कोर्ट ने Central GST Act की 'सप्लाई' (Supply) की परिभाषा पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि 'किसी कार्य को न करने या किसी कार्य या स्थिति को सहन करने' को टैक्सेबल सर्विस तभी माना जा सकता है जब इसके लिए एक अलग से एग्रीमेंट (Agreement) हो। सिर्फ़ कोर्ट के फैसले का पालन करने या अवॉर्ड सेटल करने के लिए दिए गए पैसे को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने इस तरह के टैक्स अथॉरिटीज के ब्रॉड इंटरप्रिटेशन (Broad Interpretation) पर हैरानी भी जताई।

टैक्स विभाग का आक्रामक रवैया

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ GST इंटेलिजेंस (DGGI) ने इस ₹1,524 करोड़ की डिमांड के लिए काफी आक्रामक रवैया अपनाया था। अक्सर टैक्स बेस (Tax Base) बढ़ाने के लिए, विभाग ट्रांजैक्शन्स (Transactions) को नए सिरे से क्लासिफाई (Classify) करने की कोशिश करता है। हालांकि, इस बार हाई कोर्ट ने टैक्स विभाग के नजरिए को सिरे से खारिज कर दिया।

यह फैसला उन कंपनियों के लिए बड़ी संजीवनी है जिन्हें आर्बिट्रेशन सेटलमेंट, पेनल्टी या कंपेनसेशन (Compensation) के भुगतान पर GST नोटिस मिले हैं। यह स्पष्ट करता है कि लीगल अवॉर्ड (Legal Award) और कमर्शियल सर्विस ट्रांजैक्शन (Commercial Service Transaction) के बीच एक स्पष्ट अंतर है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.