यह खबर कमोडिटी मार्केट के लिए एक बड़ा डेवलपमेंट है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) के अप्रैल 2020 के क्रूड ऑयल फ्यूचर्स को नेगेटिव कीमत पर सेटल करने के फैसले के खिलाफ दायर की गई 20 से अधिक याचिकाओं को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ किया है कि NYMEX से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट्स के रिस्क को स्वीकारने वाले ट्रेडर्स बाजार की अस्थिरता के बावजूद उसके नियमों से बंधे होंगे।
क्या हुआ?
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) के एक अहम फैसले को सही ठहराया है। अप्रैल 2020 में, जब कोरोना महामारी के कारण वैश्विक तेल बाजार में भारी गिरावट आई थी, तब MCX ने क्रूड ऑयल फ्यूचर्स को ₹(-)2,884 प्रति बैरल के नेगेटिव प्राइस पर सेटल किया था। इस फैसले के खिलाफ कई ट्रेडर्स ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इन याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि एक्सचेंज ने कॉन्ट्रैक्ट के नियमों के अनुसार ही काम किया था।
नेगेटिव प्राइसिंग पर विवाद क्यों?
यह पूरा मामला इस सवाल पर टिका था कि क्या किसी कमोडिटी का भाव जीरो से नीचे जा सकता है। याचिकाकर्ताओं, जिनमें धनतेरस डायमंड्स जैसी कंपनियां भी शामिल थीं, का तर्क था कि MCX पर पिछले 15 सालों में क्रूड ऑयल ट्रेडिंग के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि MCX को आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करके इन ट्रेड्स को रद्द करना चाहिए था या ₹1 पर सेटल करना चाहिए था, न कि नेगेटिव प्राइस पर। ट्रेडर्स का यह भी कहना था कि पेंडेमिक के दौरान ट्रेडिंग के घंटे कम होने की वजह से वे अपने पोजीशन्स को ठीक से मैनेज नहीं कर पाए।
कोर्ट ने MCX के पक्ष में फैसला क्यों सुनाया?
MCX और SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) का पक्ष यह था कि क्रूड ऑयल कॉन्ट्रैक्ट्स सीधे NYMEX (न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज) के बेंचमार्क से जुड़े थे। जब ट्रेडर्स ने ये कॉन्ट्रैक्ट्स साइन किए थे, तब उन्होंने इस पद्धति को स्वीकार किया था। कोर्ट ने पाया कि कमोडिटी फ्यूचर्स स्वाभाविक रूप से सट्टा (speculative) होते हैं, और ट्रेडर्स इसमें शामिल होने से पहले इससे जुड़े जोखिमों को पूरी तरह समझते हैं। जजों ने इस बात पर जोर दिया कि एक्सचेंज ने नेगेटिव प्राइसिंग की संभावना को लेकर जरूरी सलाह और जोखिम की जानकारी दी थी। चूँकि MCX का कॉन्ट्रैक्ट NYMEX बेंचमार्क के प्रदर्शन से बंधा था, इसलिए एक्सचेंज अंतरराष्ट्रीय कीमतों को दर्शाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य था, भले ही वे नेगेटिव हो जाएं।
कमोडिटी निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस फैसले से भारतीय डेरिवेटिव्स मार्केट में कॉन्ट्रैक्ट की निश्चितता (contractual certainty) को लेकर एक मजबूत मिसाल कायम हुई है। यह पुष्टि करता है कि जब निवेशक एक्सचेंज-ट्रेडेड प्रोडक्ट्स में भाग लेते हैं, तो वे कॉन्ट्रैक्ट की स्पेसिफिकेशन्स से कानूनी रूप से बंधे होते हैं, भले ही बाजार की परिस्थितियां कितनी भी चरम या असामान्य क्यों न हों। निवेशकों के लिए, यह एक याद दिलाता है कि डेरिवेटिव्स इंस्ट्रूमेंट्स हाई-रिस्क वाले होते हैं और कॉन्ट्रैक्ट्स को गंभीर बाजार दबाव के दौरान भी काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि अदालतें केवल इसलिए किसी ट्रेड को रद्द या अमान्य करने में हस्तक्षेप नहीं करेंगी क्योंकि बाजार ट्रेडर के खिलाफ चला गया है, बशर्ते एक्सचेंज ने सहमत नियमों और डिस्क्लोजर नॉर्म्स का पालन किया हो।
आगे क्या देखना है?
निवेशकों के लिए आगे की मुख्य बात यह है कि वे जोखिम प्रकटीकरण दस्तावेजों (risk disclosure documents) का पालन करें। हालाँकि यह मामला अप्रैल 2020 के सेटलमेंट पर विवाद को समाप्त करता है, लेकिन यह निवेशकों के लिए अपने ट्रेड्स के अंतर्निहित बेंचमार्क को समझने की आवश्यकता को पुष्ट करता है। निवेशक यह देखना जारी रख सकते हैं कि एक्सचेंज अत्यधिक अस्थिरता का प्रबंधन कैसे करते हैं और वैश्विक बाजार दुर्घटनाओं के दौरान आपातकालीन जोखिम प्रबंधन प्रोटोकॉल के संबंध में कोई नई नियामक दिशानिर्देश उभरती हैं या नहीं।
