कोर्ट ने क्यों कहा ज़ब्ती गैरकानूनी?
जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती सते की बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि CGST एक्ट, 2017 के तहत GST अधिकारियों को यह अधिकार नहीं है कि वे केवल तलाशी (Search) के दौरान मिले कैश को जब्त कर लें। कोर्ट ने यह भी कहा कि ₹1 करोड़ की ज़ब्ती "मनमानी, अनुचित और कानून के अधिकार के बिना" थी। यह अहम फैसला 10 मार्च, 2026 को सुनाया गया, जिसमें कोर्ट ने जब्त किए गए ₹1 करोड़ ब्याज सहित दो हफ्तों के अंदर वादी को वापस करने का आदेश दिया। यह ज़ब्ती जून 2023 में एक फेक इनवॉइसिंग (Fake Invoicing) नेटवर्क के खिलाफ हुई जांच के दौरान की गई थी, जिसमें ₹312.8 करोड़ के इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) फ्रॉड का शक था।
कानूनी दलील: कैश 'माल' नहीं है?
याचिकाकर्ता की ओर से वकील अभिषेक ए. रस्तोगी ने तर्क दिया कि CGST एक्ट के तहत केवल "माल, दस्तावेज़, किताबें या वस्तुएं" (Goods, Documents, Books or Things) ही जब्त की जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि कैश, जिसे कानूनन 'धन' (Money) माना जाता है, इस श्रेणी में नहीं आता। रस्तोगी ने यह भी बताया कि CGST एक्ट की धारा 67 के तहत, अधिकारियों को जब्त की जाने वाली वस्तुओं के बारे में "यह मानने का कारण" (Reason to Believe) रिकॉर्ड करना होता है, जो इस मामले में नहीं किया गया। इसके अलावा, विभाग ने धारा 67(7) के तहत आवश्यक छह महीने की अवधि के भीतर नोटिस भी जारी नहीं किया था। कोर्ट ने माना कि विभाग कैश और GST जांच के बीच सीधा संबंध साबित करने में नाकाम रहा।
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को फंड ट्रांसफर पर कोर्ट का सवाल
GST विभाग के लिए एक और बड़ा झटका तब लगा जब कोर्ट ने यह सीखा कि जब्त किए गए ₹1 करोड़ को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को ट्रांसफर कर दिया गया था। जस्टिस कुलकर्णी और सते ने हैरानी जताते हुए पूछा कि GST अधिकारी एक एजेंसी से दूसरी एजेंसी को कैश क्यों ट्रांसफर करेंगे, क्योंकि CGST एक्ट इसकी इजाजत नहीं देता। इस ट्रांसफर ने GST विभाग के ज़ब्ती के मामले को और कमजोर कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उसके फैसले का असर केवल GST ज़ब्ती की वैधता पर है, और यह इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को अपने कानूनों के तहत पैसे के स्रोत की जांच करने से नहीं रोकता।
अधिकारों का दुरुपयोग और प्रक्रियात्मक गलतियों का जोखिम
यह फैसला GST इंटेलिजेंस यूनिट्स द्वारा अधिकारों के संभावित दुरुपयोग को उजागर करता है, जो अक्सर फेक इनवॉइसिंग और ITC फ्रॉड जैसे मामलों में कैश जब्त करती रही हैं। कोर्ट के सख्त रुख से यह साफ है कि कानूनी प्रक्रियाओं का पालन सख्ती से होना चाहिए। अगर कैश का GST कानून के तहत टैक्स चोरी से सीधा और कानूनी संबंध 'Reason to Believe' के साथ साबित नहीं होता, तो ऐसी ज़ब्ती को चुनौती दी जा सकती है। कानूनी शक्तियों की गलत व्याख्या और नोटिस में देरी जैसी प्रक्रियात्मक गलतियां प्रवर्तन एजेंसियों के लिए बड़ा जोखिम पैदा करती हैं। इस फैसले का मतलब है कि अधिकारियों को अब किसी भी कैश ज़ब्ती के लिए सीधा कानूनी आधार साबित करना होगा।
भविष्य की GST छापों पर असर
यह फैसला पूरे भारत में GST छापों (Searches) और ज़ब्ती (Seizures) पर व्यापक प्रभाव डालेगा। यह फिर से दोहराता है कि टैक्स अधिकारियों की विस्तृत जांच शक्तियों का उपयोग सख्ती से कानून के अनुसार ही किया जाना चाहिए। अब व्यवसायों के पास उन ज़ब्तियों को चुनौती देने के मजबूत आधार हो सकते हैं जिन्हें वे मनमाना मानते हैं, क्योंकि GST अधिकारियों को अब जब्त किए गए कैश की प्रासंगिकता को टैक्स मामलों से जोड़कर स्पष्ट रूप से साबित करना होगा। उम्मीद है कि यह फैसला GST इंटेलिजेंस यूनिट्स को अपनी प्रक्रियाओं की समीक्षा करने और छापों, ज़ब्ती तथा नोटिस के लिए सावधानीपूर्वक दस्तावेज़ीकरण और CGST एक्ट के सख्त अनुपालन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करेगा।
