बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने महाराष्ट्र सरकार को स्टेनोग्राफर्स के लिए जस्टिस शेट्टी कमीशन की वेतनमान सिफारिशों को लागू करने का आदेश दिया है। सरकार को **2003** से बकाया राशि का भुगतान **6%** ब्याज के साथ अगले **छह महीनों** में करना होगा, जिसका असर राज्य के बजट पर पड़ सकता है।
क्या हुआ?
बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने महाराष्ट्र सरकार को एक बड़ा निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि सरकार जस्टिस शेट्टी कमीशन द्वारा स्टेनोग्राफर्स के लिए सुझाए गए वेतनमान (Pay Scale) की सिफारिशों को लागू करे। कोर्ट का आदेश है कि यह वेतन संशोधन 1 अप्रैल, 2003 से प्रभावी माना जाएगा। राज्य सरकार को अगले छह महीने के अंदर बकाया राशि की गणना कर उसका भुगतान करना होगा। खास बात यह है कि इस बकाया राशि पर 7 अक्टूबर, 2009 से 6% सालाना ब्याज भी देना होगा।
राज्य के खजाने पर क्या होगा असर?
जो लोग राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य पर नजर रखते हैं, उनके लिए यह फैसला एक नई देनदारी (Liability) लेकर आया है। जब कोर्ट लंबे समय से रुके हुए वेतन के बकाया का भुगतान करने का आदेश देते हैं, तो यह राज्य सरकार के खर्चों में जुड़ जाता है। इस तरह के बड़े भुगतान के लिए सरकार को अपने बजट से फंड आवंटित करना पड़ता है, जो अन्य विकास परियोजनाओं या पूंजीगत खर्चों (Capital Spending) के लिए उपलब्ध राशि को प्रभावित कर सकता है। राज्य-स्तरीय लोक वित्त (Public Finance) की निगरानी करने वाले निवेशक और विश्लेषक अक्सर ऐसे अदालती फैसलों पर ध्यान देते हैं क्योंकि ये बजट अनुमानों (Budget Estimates) में अनियोजित संशोधन का कारण बन सकते हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह कानूनी लड़ाई 2015 में 37 स्टेनोग्राफर्स द्वारा दायर एक याचिका के साथ शुरू हुई। मूल मुद्दा जस्टिस शेट्टी कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में ही राज्यों को अपनाने का निर्देश दिया था। हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने 2011 में इन सिफारिशों को स्वीकार करते हुए एक प्रस्ताव जारी किया था, लेकिन 2018 के एक बाद के प्रस्ताव ने भ्रम पैदा कर दिया, जब उसने लाभों को केवल भविष्य की तारीख तक सीमित करने की कोशिश की। इसने लंबे समय तक कानूनी अनिश्चितता को जन्म दिया।
कोर्ट ने क्या कहा?
अपने आदेश में, जस्टिस किशोर सी संत और जस्टिस सुशील एम. घोदेशवर की पीठ ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि राज्य ने मामले में देरी करने की बार-बार कोशिश की है। बेंच ने विशेष रूप से सरकार के इस तर्क की आलोचना की कि पांचवें वेतन आयोग (5th Pay Commission) के पुराने वेतनमान कर्मचारियों के लिए अधिक फायदेमंद थे। कोर्ट ने शेट्टी कमीशन की सिफारिशों को पीछे की तारीख से लागू करने से बचने के राज्य के प्रयास को खारिज कर दिया।
आगे क्या?
इस घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात राज्य सरकार द्वारा अनुपालन की समय-सीमा है। सरकार के पास अब इन भुगतानों को निपटाने के लिए छह महीने की समय-सीमा है। बाजार पर्यवेक्षक और लोक नीति (Public Policy) में रुचि रखने वाले लोग इस बात पर नजर रखेंगे कि सरकार आदेश को लागू करने की दिशा में बढ़ती है या हाई कोर्ट के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का फैसला करती है। अंतिम वित्तीय प्रभाव इस फैसले से कवर होने वाले योग्य कर्मचारियों की कुल संख्या और राज्य के खजाने से होने वाले भुगतान पर निर्भर करेगा।
