BSE को बड़ा झटका! NCLAT ने IBC को दी सर्वोच्चता, Demat Accounts पर NCLT के फैसले को हरी झंडी

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
BSE को बड़ा झटका! NCLAT ने IBC को दी सर्वोच्चता, Demat Accounts पर NCLT के फैसले को हरी झंडी
Overview

नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) की उन अपीलों को खारिज कर दिया है जिनमें NCLT के Insolvency के दौरान Demat Accounts को फ्रीज से हटाने के आदेशों को चुनौती दी गई थी। इस फैसले से Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) की सर्वोच्चता एक बार फिर स्थापित हुई है।

NCLAT के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि Insolvency और Liquidation के मामलों में IBC के प्रावधान ही सर्वोपरि रहेंगे। ट्रिब्यूनल ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के उन आदेशों को बरकरार रखा, जिनमें Insolvency प्रक्रिया से गुजर रही कंपनियों जैसे Future Corporate Resources और Liz Traders and Agents के Demat Accounts को फ्रीज से हटाने (unfreeze) के निर्देश दिए गए थे।

BSE का तर्क था कि Demat Accounts से जुड़े मामले पूरी तरह से सिक्यूरिटीज़ लॉ और SEBI के दायरे में आते हैं, लेकिन NCLAT ने इसे यह कहकर खारिज कर दिया कि IBC की धारा 238 में स्पष्ट है कि Insolvency के दौरान यह कोड अन्य कानूनों पर वरीयता रखता है।

इस फैसले से Insolvency Resolution Professionals (IRPs) की राह आसान हो गई है। अब वे कंपनियों की संपत्ति की वसूली (asset recovery) के लिए Demat Accounts को फ्रीज होने से छुड़ा सकेंगे, भले ही यह फ्रीज बकाया लिस्टिंग फीस या नियमों के उल्लंघन के कारण क्यों न लगाया गया हो।

इस खबर का असर BSE के शेयर पर भी दिखा। शेयर में 3.82% की गिरावट आई और यह ₹2,779.80 पर ट्रेड कर रहा था, जबकि वॉल्यूम 3.94 मिलियन रहा। पिछले पांच दिनों में शेयर 3.52% लुढ़का है, हालांकि इस साल यह अभी भी 9.80% ऊपर है।

यह फैसला IBC के बढ़ते दबदबे को दर्शाता है। गौर करने वाली बात है कि BSE खुद भी कई बार कंपनियों के खिलाफ बकाया लिस्टिंग फीस वसूलने के लिए IBC के तहत Insolvency की कार्रवाई शुरू कर चुका है। NCLAT का यह निर्णय खास तौर पर एक्सचेंजों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह Insolvency के दौरान संपत्ति प्रबंधन को लेकर अधिकार क्षेत्र (jurisdictional) के टकराव को सुलझाता है।

बाजार की नजर से देखें तो BSE का वैल्यूएशन, जिसका TTM P/E रेश्यो करीब 51.8-55.3 है, सेक्टर के औसत P/E रेश्यो (20.36) से काफी ज्यादा है। हालांकि, इस तरह के कानूनी स्पष्टीकरण से Insolvency प्रक्रियाओं को सरल बनाने में मदद मिल सकती है, लेकिन भविष्य में ऐसे मामलों में किसी भी तरह की देरी या कानूनी लड़ाई BSE के मूल्यांकन पर दबाव डाल सकती है। कुल मिलाकर, इस फैसले से भारत के Insolvency फ्रेमवर्क में और अधिक स्पष्टता आने की उम्मीद है, जो लेनदारों (creditors) और देनदारों (debtors) दोनों के लिए एक स्थिर माहौल बनाने में मदद करेगा।

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