ऑस्ट्रेलिया हाई कोर्ट का फैसला: भारत की संप्रभु प्रतिरक्षा कायम
ऑस्ट्रेलिया के हाई कोर्ट ने भारत की संप्रभु प्रतिरक्षा (Sovereign Immunity) के दावे को मजबूती से बरकरार रखा है। सात जजों की एक बेंच ने यह फैसला सुनाया कि भारत द्वारा न्यूयॉर्क कन्वेंशन (New York Convention) पर हस्ताक्षर करने का मतलब यह नहीं है कि वह आर्बिट्रल अवार्ड्स (Arbitral Awards) को लागू करने के मामले में अपनी प्रतिरक्षा छोड़ देता है। यह फैसला एंट्रिक्स-देवा (Antrix-Devas) विवाद से जुड़े $111 मिलियन के एक अवार्ड को ऑस्ट्रेलिया में लागू (enforce) करने की कोशिश के संबंध में आया था।
कन्वेंशन पर हस्ताक्षर से प्रतिरक्षा खत्म नहीं
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने मात्र से किसी देश की न्यायिक प्रक्रिया में पेश होने की प्रतिरक्षा (immunity from jurisdiction) स्वतः माफ नहीं होती। इस तरह की छूट के लिए भारत का 'स्पष्ट और असंदिग्ध' (clear and unmistakable) इरादा होना आवश्यक है। यह निर्णय निचली अदालतों के उस निष्कर्ष के विपरीत है जिसमें माना गया था कि कन्वेंशन पर दस्तखत करने से ही यह प्रतिरक्षा समाप्त हो जाती है।
न्यूयॉर्क कन्वेंशन और ICSID का अंतर
इस फैसले ने न्यूयॉर्क कन्वेंशन के दायरे को ICSID कन्वेंशन (ICSID Convention) से अलग बताया है। कोर्ट ने कहा कि जहां ICSID कन्वेंशन के तहत राष्ट्रों को अपनाने को प्रतिरक्षा छोड़ने के तौर पर देखा गया है, वहीं न्यूयॉर्क कन्वेंशन के तहत ऐसा नहीं है। यह रुख यूनाइटेड किंगडम, यूनाइटेड स्टेट्स और कनाडा जैसे देशों के कानूनी दृष्टिकोण के अनुरूप है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और अवार्ड के दावेदारों के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव लाता है। अब उन्हें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि केवल न्यूयॉर्क कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने से संप्रभु देशों के खिलाफ अवार्ड लागू करना आसान हो जाएगा। भविष्य में, सरकारों के खिलाफ अवार्ड लागू कराने के लिए, निवेशकों को अनुबंधों या आर्बिट्रेशन क्लॉज में संप्रभु प्रतिरक्षा की 'स्पष्ट छूट' (explicit waiver) प्राप्त करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा। यह कदम देशों को अपनी संप्रभु संपत्ति की रक्षा करने में मदद करेगा, लेकिन इससे अवार्ड्स के एनफोर्समेंट की प्रक्रिया अधिक जटिल और महंगी हो सकती है।