इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि मरे हुए व्यक्तियों को जारी किए गए इनकम टैक्स री-असेसमेंट नोटिस पूरी तरह से अमान्य हैं। कोर्ट ने साफ किया कि किसी मृत व्यक्ति के खिलाफ टैक्स कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती, भले ही बाद में कानूनी वारिसों को प्रतिस्थापित किया जाए।
Detailed Coverage
कोर्ट ने क्यों कहा नोटिस अमान्य?
इलाहाबाद हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच, जिसमें जस्टिस शेखर बी. सरफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी शामिल थे, ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट का कहना है कि टैक्स कानून जीवित लोगों के लिए हैं, और किसी मृत व्यक्ति के नाम पर शुरू की गई कोई भी कानूनी कार्यवाही शुरू से ही शून्य और अमान्य है।
मामला क्या था?
यह फैसला संजय दुबे नाम के एक व्यक्ति को इनकम टैक्स विभाग द्वारा 28 मार्च 2025 को भेजे गए एक नोटिस के बाद आया। रिकॉर्ड्स के अनुसार, संजय दुबे का निधन 7 जनवरी 2024 को हो चुका था। विभाग ने प्रॉपर्टी ट्रांज़ैक्शन में कथित बेहिसाब कैश पेमेंट के संबंध में यह नोटिस भेजा था। जब विभाग ने टैक्सपेयर की पत्नी, आशा दुबे, को कानूनी प्रतिनिधि के तौर पर प्रतिस्थापित करने की कोशिश की, तो उन्होंने मूल नोटिस की वैधता को चुनौती दी।
ज्यूरिसडिक्शन की गड़बड़ या प्रोसीजरल गलती?
इनकम टैक्स विभाग ने दलील दी कि नोटिस जारी करते समय उन्हें टैक्सपेयर की मौत की जानकारी नहीं थी और बाद में कानूनी वारिस के शामिल होने से यह कमी पूरी हो जानी चाहिए। लेकिन हाई कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह एक साधारण प्रोसीजरल गलती नहीं, बल्कि एक ज्यूरिसडिक्शनल (jurisdictional) यानी अधिकार क्षेत्र की बुनियादी कमी है। इनकम टैक्स एक्ट की धारा 159 के तहत, कार्यवाही तभी जारी रखी जा सकती है जब वह मृतक के जीवनकाल में शुरू हुई हो। अगर नए सिरे से री-असेसमेंट कार्यवाही शुरू करनी है, तो वह सीधे कानूनी प्रतिनिधि के नाम पर होनी चाहिए। चूँकि पहला नोटिस ही एक मृत व्यक्ति को भेजा गया था, यह अधिकार क्षेत्र की विफलता मानी गई जिसे बाद में ठीक नहीं किया जा सकता।
टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन पर असर
कोर्ट इस बात से अवगत है कि इस फैसले से सरकार के राजस्व पर असर पड़ सकता है। इसीलिए, कोर्ट ने अपने सीनियर रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि इस जजमेंट की एक कॉपी यूनियन फाइनेंस मिनिस्ट्री को भेजी जाए। इसका मकसद सरकार को इनकम टैक्स एक्ट में विधायी संशोधन (legislative amendments) पर विचार करने के लिए प्रेरित करना है। ऐसे बदलाव विभाग को कानून के दायरे में रहते हुए मृत व्यक्तियों के टैक्स असेसमेंट को बेहतर ढंग से संभालने में मदद कर सकते हैं। टैक्सपेयर्स और उनके परिवारों के लिए, यह फैसला एक बड़ी राहत है, जो पुष्टि करता है कि टैक्स अधिकारी कानूनी तौर पर सही जीवित प्रतिनिधियों को नोटिस भेजे बिना आगे नहीं बढ़ सकते।
